यमुना रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट: साबरमती मॉडल अपनाने पर विशेषज्ञों ने दी चेतावनी
दिल्ली सरकार के यमुना रिवरफ्रंट प्लान को लेकर विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि साबरमती मॉडल अपनाने से बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।

दिल्ली सरकार यमुना नदी के किनारे 52 किलोमीटर लंबे रिवरफ्रंट विकसित करने की तैयारी कर रही है, लेकिन इस योजना ने पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि साबरमती रिवरफ्रंट की तर्ज पर बनाया जा रहा यह यमुना रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट दिल्ली के लिए भारी पड़ सकता है। जल संसाधन मंत्रालय के पूर्व सचिव शशि शेखर, SANDRP के भीम सिंह रावत और पर्यावरण कार्यकर्ता भवरीन कंधारी सहित कई दिग्गजों ने केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल को पत्र लिखकर इस प्रोजेक्ट पर सवाल उठाए हैं।
विशेषज्ञों का तर्क है कि साबरमती और यमुना की भौगोलिक और जल विज्ञान संबंधी स्थितियां पूरी तरह अलग हैं। अगर साबरमती मॉडल को यहाँ थोपा गया, तो यह नदी की प्राकृतिक क्षमता को बाधित करेगा, जिससे राजधानी में बाढ़ का खतरा काफी बढ़ जाएगा। उनका कहना है कि रिवरफ्रंट के नाम पर किए जाने वाले निर्माण कार्य से बाढ़ के मैदानों (floodplains) का प्रबंधन बिगड़ सकता है।
विकास या विनाश? विवादों में रिवरफ्रंट प्लान
एक तरफ जहां विशेषज्ञ वैज्ञानिक अध्ययन और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) की मांग कर रहे हैं, वहीं दिल्ली सरकार इस योजना को आगे बढ़ाने में जुटी है। जल मंत्री प्रवेश सहिब सिंह ने पुष्टि की है कि साबरमती रिवरफ्रंट डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (SRFDCL) के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर करने की प्रक्रिया चल रही है।
इस पूरे प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को सौंपी गई है, जो इसके डिजाइन और निर्माण की रूपरेखा तैयार कर रहा है। योजना के मुताबिक, यहाँ ग्रीन स्पेस, साइकिल ट्रैक और वॉकिंग पाथ बनाए जाएंगे। इस प्रोजेक्ट को दो चरणों में बांटा गया है, जिसमें पहला चरण वजीराबाद के पुराने रेलवे पुल से सराय काले खां के पास NH-24 तक के 24 किलोमीटर के हिस्से को कवर करेगा। DDA ने इस काम को पूरा करने की समय सीमा 30 जून, 2026 तय की है।
आलोचकों का कहना है कि जब यमुना नदी प्रदूषण और क्षरण से जूझ रही है, तो सरकारी संसाधनों का उपयोग बड़े पैमाने पर शहरी विकास के बजाय नदी की सफाई और उसके पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए किया जाना चाहिए।