दिल्ली यूनिवर्सिटी में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने भारत-पाक विभाजन को बताया अमानवीय अध्याय

दिल्ली यूनिवर्सिटी में 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के मौके पर उपराष्ट्रपति और यूनिवर्सिटी के चांसलर सी. पी. राधाकृष्णन ने शुक्रवार को 1947 के भारत-पाकिस्तान के बंटवारे को देश के इतिहास का सबसे दुखद और अमानवीय अध्याय बताया। यह कार्यक्रम यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर इंडिपेंडेंस एंड पार्टीशन स्टडीज और इंडियन काउंसिल ऑफ एतिहासिक रिसर्च (ICHR) के सहयोग से आयोजित एक नेशनल सेमिनार में हुआ। उपराष्ट्रपति ने इस बात पर जोर दिया कि इस आयोजन का मकसद पुराने जख्मों को हरा करना नहीं, बल्कि देश में एकता और भाईचारे को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि इस बंटवारे के दौरान एक करोड़ से ज्यादा लोग विस्थापित हुए थे, जिसका पैमाना इतना बड़ा था कि इसे एकेडमिक किताबों में सिर्फ एक छोटे से जिक्र तक सीमित नहीं रखना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां आज़ादी की असली कीमत को समझ सकें।
समारोह में शरणार्थियों का सम्मान और 'नो ड्रग्स' की शपथ
कार्यक्रम के दौरान 1947 के बंटवारे के 15 जीवित बचे लोगों (शरणार्थियों) को सम्मानित किया गया और प्रधानमंत्री म्यूजियम एंड लाइब्रेरी तथा ICHR की पुरानी आर्काइवल सामग्री की एक प्रदर्शनी भी लगाई गई। दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर योगेश सिंह ने बताया कि यह सेमिनार देश के बंटवारे की परिस्थितियों पर विचार करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है। अपने संबोधन के दौरान, उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने नागरिकों से क्षेत्रीय या संकीर्ण पहचान के मुकाबले अपनी राष्ट्रीय पहचान को प्राथमिकता देने की अपील की। इसके साथ ही उन्होंने वहां मौजूद स्टूडेंट्स को 'नो ड्रग्स' (नशामुक्ति) की शपथ भी दिलाई। सेंटर फॉर इंडिपेंडेंस एंड पार्टीशन स्टडीज की स्थापना 2023 में की गई थी, जो बंटवारे के दौर के इतिहास को दर्ज करने के लिए जीवित बचे लोगों से ओरल टेस्टिमनी (जुबानी गवाही) जुटाने का काम लगातार कर रहा है।