बेटी को खोने के बाद पिता ने शुरू किया 'तराशा फाउंडेशन', दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे परिवारों को मिलेगी मदद

बेटी को खोने के बाद पिता ने शुरू किया तराशा फाउंडेशन, अब दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे परिवारों को मिलेगी मदद और सही इलाज।

Kittu Kumari24 October 20262 min read0 viewsDelhi Local
बेटी को खोने के बाद पिता ने शुरू किया 'तराशा फाउंडेशन', दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे परिवारों को मिलेगी मदद

एक पिता की अपनी बेटी को खोने की गहरी पीड़ा अब देश के हजारों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बनने जा रही है। नई दिल्ली में तराशा फाउंडेशन की शुरुआत की गई है, जिसका मुख्य उद्देश्य लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (LSD) और अन्य दुर्लभ वंशानुगत बीमारियों से जूझ रहे परिवारों को जरूरी सहायता, मार्गदर्शन और इलाज के लिए आवाज उठाने में मदद करना है।

इस फाउंडेशन की नींव करण भार्गवा ने रखी है, जो स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र का एक जाना-माना नाम हैं। यह पहल उनकी बेटी तराशा भार्गवा की याद में शुरू की गई है, जिनका 18 सितंबर 2025 को 'फ्यूकोसिडोस' (Fucosidosis) नामक एक दुर्लभ बीमारी के कारण निधन हो गया था। करण भार्गवा ने महसूस किया कि भारत में ऐसी दुर्लभ बीमारियों के निदान (Diagnosis) और इलाज के संसाधनों में बहुत बड़ी कमी है, जिसे दूर करने के लिए उन्होंने इस संस्था का गठन किया है।

निदान की मुश्किलों को आसान बनाने की कोशिश

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बता दें कि फ्यूकोसिडोस एक बेहद दुर्लभ जेनेटिक विकार है, जो दुनिया में 20 लाख लोगों में से किसी एक को होता है। तराशा को महज 18 महीने की उम्र में विकास में देरी के कारण यह बीमारी हुई थी। इलाज के दौरान उनके परिवार को न केवल जरूरी दवाओं की कमी का सामना करना पड़ा, बल्कि देश में स्टेम सेल डोनर्स की भारी किल्लत भी महसूस हुई।

तराशा फाउंडेशन अब इन चुनौतियों को कम करने के लिए काम कर रहा है। संस्था के मुख्य लक्ष्यों में शामिल हैं:

  • एक समर्पित रजिस्ट्रेशन प्लेटफॉर्म के जरिए मरीजों के निदान की प्रक्रिया को छोटा और तेज करना।
  • DCGI, US FDA और EMA जैसी संस्थाओं से दवाओं की मंजूरी में तेजी लाने के लिए पैरवी करना।
  • जीन थेरेपी, CRISPR तकनीक और एंजाइम इंजीनियरिंग जैसे वैश्विक शोधों पर नजर रखना ताकि भारत में 'एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी' लाई जा सके।

हालांकि फ्यूकोसिडोस का फिलहाल कोई स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह फाउंडेशन उन परिवारों को सशक्त बनाने और एक समुदाय बनाने की कोशिश कर रहा है जो आज भी इन कठिन बीमारियों के साथ अकेले संघर्ष कर रहे हैं।

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