ताजमहल के इतिहास का सच आया सामने, राजा जयसिंह की हवेली पर बना है मकबरा और बेसमेंट के कमरों का पूरा सच

Kittu Kumari4 August 20262 min read47 viewsNational
ताजमहल के इतिहास का सच आया सामने, राजा जयसिंह की हवेली पर बना है मकबरा और बेसमेंट के कमरों का पूरा सच

ताजमहल के इतिहास और इसके नीचे बने कमरों को लेकर महत्वपूर्ण खुलासे सामने आए हैं। ऐतिहासिक रिकॉर्ड और Archaeological Survey of India (ASI) के अनुसार, जिस जगह पर आज ताजमहल है, वहां पहले आमेर के कछवाहा राजपूत राजा जयसिंह प्रथम की एक भव्य हवेली हुआ करती थी। मुगल बादशाह शाहजहाँ ने यह जमीन राजा जयसिंह से बलपूर्वक नहीं, बल्कि आगरा के बीचों-बीच स्थित चार बड़ी हवेलियों के बदले में ली थी। इस बात की पुष्टि शाही फर्मानों और 'पादशाह-नामा' जैसे मुगल काल के ग्रंथों में मिलती है। यह जमीन पहले राजा जयसिंह के दादा राजा Man Singh का निवास स्थान थी, जिसे एक शानदार गुंबददार इमारत बताया गया है।

ताजमहल के नीचे बने कमरों का रहस्य

ताजमहल के नीचे बने 22 कमरों को तहखाना कहा जाता है, जो असल में एक लंबे आर्च वाले कॉरिडोर का हिस्सा हैं। इन्हें मुख्य मकबरे की स्थिरता और नींव को मजबूत करने के लिए डिजाइन किया गया था। ASI और इतिहासकारों का कहना है कि इन कमरों को आम जनता के लिए बंद रखा जाता है ताकि स्मारक की संरचना सुरक्षित रहे। इस इलाके में नमी और बाढ़ का खतरा ज्यादा रहता है, जिससे दीवारों में दरारें आ सकती हैं और ढांचा कमजोर हो सकता है। ज्यादा लोगों के आने-जाने से नींव को नुकसान पहुंच सकता है और अंधेरी व संकरी जगह होने के कारण सुरक्षा संबंधी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं।

ASI की सफाई और कोर्ट में याचिका का मामला

ASI के अधिकारियों और पुरातत्वविदों ने स्पष्ट किया है कि इन कमरों में कोई छिपा हुआ खजाना, मंदिर या हिंदू देवी-देवता नहीं हैं। ASI द्वारा जारी की गई तस्वीरें भी इसकी पुष्टि करती हैं और कर्मचारी नियमित रूप से इन कमरों का निरीक्षण व सफाई करते हैं। जुलाई 2026 में Allahabad High Court में एक याचिका दायर कर यह दावा किया गया था कि यह स्मारक मूल रूप से 'तेजो महालय' नाम का एक शिव मंदिर था और इसकी जांच की मांग की गई थी। इसके बावजूद ASI का यही कहना है कि ताजमहल 17वीं सदी का एक मकबरा है जिसे शाहजहाँ ने बनवाया था और मंदिर के दावों का समर्थन करने वाला कोई सबूत नहीं है। कोर्ट और इतिहासकारों (जिसमें ASI भी शामिल है) ने पुख्ता archaeological evidence की कमी के कारण ऐसे ऐतिहासिक दावों को खारिज कर दिया है।

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