2020 दंगे: 'मार्गदर्शन करने वाला हाथ भी उतना ही दोषी', ताहिर हुसैन को 2 साल की सजा

दिल्ली की एक अदालत ने साल 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े एक मामले में पूर्व AAP पार्षद ताहिर हुसैन को दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने अपने फैसले में बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जो हाथ हिंसा का मार्गदर्शन करता है, वह उस हाथ जितना ही दोषी है, या शायद उससे भी अधिक, जो वास्तव में हमला करता है।
कड़कड़डूमा कोर्ट के एडिशनल सेशन जज प्रवीण सिंह ने यह फैसला सुनाते हुए ताहिर हुसैन पर 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है। अदालत ने माना कि हुसैन एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि थे, जिनसे यह उम्मीद की गई थी कि वे सांप्रदायिक तनाव के माहौल में शांति बनाए रखने में मदद करेंगे। लेकिन इसके उलट, उन्होंने दंगाइयों को अपना घर उपलब्ध कराया, जिसका इस्तेमाल हमले करने और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए एक ऊंचे ठिकाने के तौर पर किया गया।
जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी और अदालत की टिप्पणी
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जिस पद का उपयोग हिंसा रोकने के लिए किया जाना चाहिए था, उसका उपयोग हिंसा को बढ़ावा देने के लिए किया गया। यह कृत्य अपराध की गंभीरता को दर्शाता है और इसे एक मिसाल के तौर पर देखा जाना चाहिए। ताहिर हुसैन को आईपीसी की धारा 147 और 109 के तहत दंगा करने और उकसाने का दोषी पाया गया था। यह मामला दयालपुर थाने में दर्ज एफआईआर नंबर 120/2020 से संबंधित है।
अभियोजन पक्ष ने दलील दी थी कि हुसैन एक 'रिपीट ऑफेंडर' हैं क्योंकि वे पहले भी एक दंगे के मामले में दोषी पाए जा चुके हैं। यह भी कहा गया कि खजुरी खास और करावल नगर रोड इलाकों में उनके घर को हिंसा का केंद्र बनाया गया था, जहाँ से दंगाइयों को हमले के लिए बेहतर नजरिया मिला।
दूसरी ओर, ताहिर हुसैन के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल ने शारीरिक रूप से दंगों में हिस्सा नहीं लिया और उनके घर पर दंगाइयों ने जबरन कब्जा कर लिया था। उन्होंने यह भी दावा किया कि हुसैन ने घटना के दौरान पीसीआर कॉल किए थे। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को खारिज कर दिया। जज ने कहा कि भीड़ में शारीरिक रूप से मौजूद न होने से अपराध की गंभीरता कम नहीं हो जाती। साथ ही, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि हुसैन ने इस बात का कोई सबूत नहीं दिया कि उनके घर पर जबरन कब्जा हुआ था और न ही उन्होंने इस संबंध में कोई शिकायत दर्ज कराई थी।