वंदे मातरम के 6 छंदों का अनिवार्य गायन गलत, सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
सुप्रीम कोर्ट में वंदे मातरम के छह छंदों को अनिवार्य करने के सरकारी आदेश और सजा के प्रावधानों को चुनौती दी गई है।

देश के सर्वोच्च न्यायालय में केंद्र सरकार के उस आदेश को लेकर कानूनी जंग छिड़ी हुई है, जिसमें 'वंदे मातरम' के छह छंदों को अनिवार्य रूप से गाने और बजाने का निर्देश दिया गया है। वंदे मातरम अनिवार्य गायन से जुड़ी इन याचिकाओं पर जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने सुनवाई की। यह पूरा विवाद गृह मंत्रालय द्वारा जनवरी और जुलाई 2026 में जारी किए गए उन निर्देशों से शुरू हुआ, जिनमें खास तौर पर छह छंदों वाले संस्करण को अपनाने की बात कही गई थी।
इस मामले को चुनौती देने वालों में संगीतकार टी.एम. कृष्णा, पूर्व आईएएस अधिकारी बालकृष्ण सत्यभामा मावोजि और बौद्ध विद्वान बी.डी. बोरकर जैसे नाम शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि गीत के इन छह छंदों में हिंदू देवी-देवताओं जैसे दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती का आह्वान किया गया है, जो भारत के धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक ढांचे के खिलाफ है। उनका कहना है कि किसी व्यक्ति को अपनी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध ऐसा करने के लिए मजबूर करना संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिलने वाली व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
सजा के प्रावधान और संवैधानिक अधिकारों पर बहस
मामला सिर्फ गीत गाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सजा का डर भी जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने 'राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण अधिनियम, 1971' में 2026 में किए गए संशोधन को भी चुनौती दी है। इस संशोधन के तहत, यदि कोई व्यक्ति गीत गाने में बाधा डालता है, तो उसे तीन साल तक की जेल या जुर्माने की सजा हो सकती है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील एस. मुरलीधर ने दलील दी कि यदि कोई नागरिक अपनी अंतरात्मा या धार्मिक विश्वास के कारण गीत नहीं गाता, तो उसे अपराधी नहीं माना जाना चाहिए और न ही उसके खिलाफ आपराधिक मामला चलाया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान 1986 के 'बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य' मामले का जिक्र किया, जिसमें राष्ट्रीय गान न गाने वालों को दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा दी गई थी। कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह यह तय नहीं करेगा कि 'राष्ट्रीय गीत' क्या होना चाहिए, लेकिन वह इस बात की जांच जरूर करेगा कि क्या धार्मिक या वैचारिक आधार पर गीत न गाने वालों को संवैधानिक सुरक्षा मिलनी चाहिए।
वहीं, केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपना पक्ष रखा। इस कानूनी लड़ाई के बीच एक अन्य याचिका भी है, जिसे दिल्ली हाई कोर्ट से ट्रांसफर करने की मांग की गई है। अश्विनी दुबे नामक याचिकाकर्ता ने मांग की है कि 'वंदे मातरम' को 'जन गण मन' के समान दर्जा दिया जाए और सभी शिक्षण संस्थानों में इसे अनिवार्य किया जाए। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या 'आनंदमठ' के छह छंदों वाले संस्करण को अनिवार्य करना सही है और क्या इसे न गाने वालों को राष्ट्रीय गीत का अपमान माना जाएगा।