Supreme Court का बड़ा फैसला: 2003 लिफ्ट हादसे में RAW अधिकारी के परिवार को मिलेगा ₹3.01 करोड़ मुआवजा

दिल्ली में साल 2003 में हुए एक दुखद लिफ्ट हादसे के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने RAW अधिकारी के परिवार को ₹3.01 करोड़ का मुआवजा देने के आदेश को बरकरार रखा है। इस मामले से जुड़ी मुख्य बातें:
* साल 2003 में हुए लिफ्ट हादसे में RAW अधिकारी की मौत हुई थी।
* सुप्रीम कोर्ट ने Otis Elevator Company की अपील को खारिज कर दिया है।
* लिफ्ट को 'कॉमन कैरियर' माना गया है, जिससे निर्माताओं की जिम्मेदारी बढ़ गई है।
* मुआवजे की राशि में OTIS, MES और RAW की क्रमशः 70%, 25% और 5% जिम्मेदारी तय की गई है।
हादसे के बाद लंबी कानूनी लड़ाई
यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना 20 मार्च 2003 को हुई थी, जिसमें RAW अधिकारी की जान चली गई थी। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि यात्री अपनी सुरक्षा पूरी तरह से मशीनरी पर छोड़ देते हैं, इसलिए सुरक्षा में चूक बर्दाश्त नहीं की जा सकती। साल 2014 में नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) ने परिवार को यह मुआवजा देने का फैसला सुनाया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया है। मृतक की पत्नी रश्मि हांडा और उनके दो बच्चों को यह राशि दी जाएगी।
लिफ्ट में तकनीकी खामियों को लेकर लापरवाही
कोर्ट ने पाया कि Otis Elevator Company को जुलाई 2002 से ही लिफ्ट में वोल्टेज फ्लक्चुएशन की समस्या के बारे में जानकारी थी। कंपनी ने वोल्टेज स्टेबलाइजर लगाने का सुझाव तो दिया था, लेकिन उसे ठीक से लागू नहीं किया और न ही लिफ्ट को असुरक्षित घोषित किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कंपनी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती क्योंकि वे सेवा में कमी (deficiency in service) के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं।
मुआवजे की वसूली की राह आसान
सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित परिवार की अपील को स्वीकार करते हुए NCDRC को निर्देश दिया है कि मुआवजा और उस पर जुड़ा ब्याज वसूलने के लिए तुरंत कार्रवाई शुरू की जाए। इस फैसले के बाद अब परिवार को बिना किसी देरी के मुआवजे का भुगतान मिल सकेगा। यह फैसला दिल्ली-NCR समेत देशभर की उन इमारतों के लिए एक बड़ी मिसाल है जहाँ पुरानी लिफ्ट का इस्तेमाल हो रहा है, क्योंकि अब कंपनियों की जवाबदेही पहले से कहीं अधिक सख्त हो गई है।