दिल्ली-एनसीआर में महिलाओं की सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, स्वतः संज्ञान लेते हुए सिस्टम की नाकामी पर उठाए सवाल

Kittu Kumari28 September 20263 min read3 viewsDelhi Local
दिल्ली-एनसीआर में महिलाओं की सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, स्वतः संज्ञान लेते हुए सिस्टम की नाकामी पर उठाए सवाल

दिल्ली-एनसीआर में हाल ही में हुए बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इस पर स्वतः संज्ञान लिया है और कानून-व्यवस्था तथा प्रशासनिक अधिकारियों से सवाल किया है कि क्या 2012 के निर्भया मामले के बाद से व्यवस्था में कोई सार्थक सुधार हुआ है या नहीं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस कार्यवाही का उद्देश्य किसी आरोपी के अपराध को तय करना नहीं है, बल्कि यह देखना है कि क्या राज्य और उसकी संस्थाओं ने महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रभावी उपाय किए हैं। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि इन घटनाओं ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता पैदा कर दी है। अदालत ने आस्था कुंज पार्क में 17 वर्षीय लड़की के साथ कथित सामूहिक बलात्कार, स्वरूप नगर में एक किशोर लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या, और ग्रेटर नोएडा से दिल्ली तक 47 किलोमीटर से अधिक दूरी तक चलने वाली स्लीपर बस के अंदर एक नाबालिग लड़की के साथ कथित यौन उत्पीड़न का जिक्र किया। अदालत ने कहा कि बस की इस घटना ने 2012 के निर्भया मामले की दर्दनाक यादों को ताजा कर दिया है। अदालत ने यह भी कहा कि लेडी श्री राम कॉलेज के छात्रों ने पहले ही आस्था कुंज पार्क के पास लगातार हो रहे यौन उत्पीड़न की शिकायत की थी, लेकिन पुलिस ने उचित गश्त नहीं की। अदालत ने सार्वजनिक स्थानों पर खराब रोशनी और कमजोर निगरानी जैसी प्रशासनिक कमियों पर भी नाराजगी जताई है।

अधिकारियों से जवाब तलब और माँगा गया विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट

अदालत ने अधिकारियों से कई सवाल पूछे हैं और यह जवाब मांगा है कि सरकार द्वारा बनाए गए सुरक्षा उपाय जमीन पर काम कर रहे हैं या नहीं। कोर्ट ने वरिष्ठ वकील लिज मैथ्यू को न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) नियुक्त किया है और इस मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर को तय की गई है। अदालत ने पार्क, सड़क, सार्वजनिक परिवहन, बाजार और शैक्षणिक संस्थानों में सुरक्षा व्यवस्था पर एक व्यापक स्टेटस रिपोर्ट मांगी है। दिल्ली पुलिस से पूछा गया है कि वह राष्ट्रीय यौन अपराधी डेटाबेस (NDSO) का उपयोग कैसे करती है। इसके अलावा, गृह मंत्रालय की ऑनलाइन प्रणाली (ITSSO), मिशन शक्ति, आपातकालीन प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली (ERSS) 112, महिला हेल्पलाइन 181, सेफ सिटी प्रोजेक्ट, महिला सहायता डेस्क और वन स्टॉप सेंटर की वर्तमान स्थिति के बारे में भी विवरण मांगा गया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अधिकारी केवल कागजी योजनाओं की सूची नहीं दे सकते, बल्कि उन्हें यह बताना होगा कि कौन सा तंत्र चालू है और उसका औसत प्रतिक्रिया समय क्या है। अदालत ने आपातकालीन नंबरों और महिला हेल्प डेस्क का व्यापक प्रचार करने का निर्देश दिया है और दिल्ली प्रशासन तथा पुलिस से स्कूलों और कॉलेजों में नियमित जागरूकता कार्यक्रम चलाने को कहा है।

चार सप्ताह के भीतर लागू करने के लिए दिए गए तत्काल उपाय

स्थिति रिपोर्ट आने तक अदालत ने चार सप्ताह के भीतर लागू किए जाने वाले कई तत्काल उपायों का आदेश दिया है। दिल्ली पुलिस कमिश्नर को हर पुलिस जिले में डीएसपी रैंक के अधिकारी की अध्यक्षता में विशेष टीमें बनाने का निर्देश दिया गया है जो संवेदनशील इलाकों का तुरंत सर्वे करेंगी। ये टीमें खराब रोशनी, अपर्याप्त निगरानी और असामाजिक तत्वों के अड्डों की पहचान करेंगी। अदालत ने सार्वजनिक पार्कों और संवेदनशील क्षेत्रों का तुरंत प्रकाश और सीसीटीवी ऑडिट करने का भी आदेश दिया है। इसके अलावा, मेट्रो स्टेशनों, बस स्टॉप और रेलवे स्टेशनों पर खराब कैमरों और लाइटों को ठीक किया जाएगा। शिकायत निवारण तंत्र का उपयोग करके अंधेरे वाले रास्तों और सुरक्षा कमियों को दूर करने के लिए कहा गया है। अदालत ने पुलिस गश्त बढ़ाने और वाहनों की खिड़कियों पर काली फिल्म और सन-कंट्रोल फिल्मों के इस्तेमाल पर रोक के पुराने आदेश को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा, दिल्ली उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को चार सप्ताह के भीतर फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSCs) और विशेष पॉक्सो अदालतों के कामकाज पर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने मुख्य सचिव, पुलिस कमिश्नर और दिल्ली उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को नोटिस जारी किया है।

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