सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: विरोध का हक है, लेकिन रास्तों पर कब्जा नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विरोध का अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक रास्तों को अनिश्चितकाल तक रोकना गलत है। पढ़ें पूरा मामला।

देश की सर्वोच्च अदालत ने विरोध प्रदर्शनों को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हालांकि हर नागरिक और संगठन को शांतिपूर्ण विरोध करने का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन कोई भी समूह किसी निर्धारित प्रदर्शन स्थल पर अनिश्चितकाल के लिए कब्जा नहीं जमा सकता। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि सार्वजनिक रास्तों और स्थानों पर आम जनता का आवागमन बाधित नहीं होना चाहिए।
यह मामला मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आया। जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच, जिसमें जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे, ने मंगलवार को इस मुद्दे पर सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन के लिए तय किए गए स्थान विभिन्न समूहों, जैसे किसानों और पत्रकारों के लिए रोटेशन के आधार पर उपलब्ध होने चाहिए। अगर कोई एक समूह वहां स्थायी रूप से कब्जा कर लेगा, तो यह दूसरों के रास्ते रोकने जैसा होगा।
व्यापारियों को भारी नुकसान और पुलिस की कार्रवाई
सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने किराना कमेटी दिल्ली और दिल्ली आयरन एंड हार्डवेयर मर्चेंट्स एसोसिएशन जैसे व्यापारिक संगठनों का पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि कनॉट प्लेस जैसे व्यावसायिक इलाकों में प्रदर्शनों और रास्तों की बंदी के कारण व्यापारियों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। वहीं, याचिकाओं में पुलिस द्वारा की गई बर्बरता, सामूहिक हिरासत, मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और इंटरनेट बंद करने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए थे।
अधिकारियों की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि प्रदर्शन आयोजकों को सार्वजनिक व्यवधान के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अक्सर प्रदर्शनों की अनुमति सीमित समय के लिए दी जाती है, लेकिन कब्जा उससे कहीं ज्यादा समय तक रहता है।
कोर्ट ने अब व्यापारिक संगठनों को निर्देश दिया है कि वे प्रदर्शन आयोजकों को इस कार्यवाही में पार्टी बनाएं ताकि उनकी बात भी सुनी जा सके। साथ ही, अदालत ने यह भी आदेश दिया कि भविष्य में विरोध प्रदर्शन की अनुमति देने या उसे खारिज करने वाले किसी भी आदेश में ठोस कारणों का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है और मामले की अगली सुनवाई तय की है।