दिल्ली में बढ़ते यौन अपराधों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पुलिस और केंद्र को दिए कड़े निर्देश

देश की राजधानी और आसपास के इलाकों में बढ़ते बलात्कार और गैंगरेप के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद गंभीर रुख अपनाया है। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस और केंद्रीय गृह मंत्रालय को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे इन जघन्य अपराधों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाएं। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने हाल की घटनाओं, जैसे स्लीपर बस में नाबालिग के साथ गैंगरेप और स्वरूप नगर व आस्था कुंज पार्क में हुए हमलों का जिक्र करते हुए इसे 2012 के निर्भया केस जैसी स्थिति बताया।
अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अपराधियों के मन में कानून का डर होना चाहिए। जस्टिस पारदीवाला ने यहाँ तक कहा कि अपराधियों को यह डर होना चाहिए कि अगर उन्होंने ऐसे घिनौने अपराध किए, तो उनकी जान जा सकती है। कोर्ट ने अब दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय से चार हफ्ते के भीतर एक विस्तृत एक्शन रिपोर्ट मांगी है।
सुरक्षा के लिए 'वार रूम' और गश्त पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि पुलिस अब केवल घटना के बाद जांच करने के बजाय अपराध को रोकने की दिशा में काम करे। सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करने के लिए निम्नलिखित निर्देश दिए गए हैं:
- स्कूलों, कॉलेजों, बस स्टॉप, पार्कों और roadside ढाबों जैसे संवेदनशील इलाकों में गश्त बढ़ाई जाए।
- शहर के 'डार्क स्पॉट्स' को खत्म कर स्ट्रीट लाइटिंग सुधारी जाए और एक्टिव सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं।
- हर पुलिस जिले में डीएसपी रैंक के अधिकारी की अगुवाई में विशेष टीमें बनाई जाएं, जो संवेदनशील क्षेत्रों की नियमित निगरानी करें।
- रियल-टाइम मॉनिटरिंग के लिए एक समर्पित 'वार रूम' की कमी पर सवाल उठाए गए हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को सख्त कार्रवाई करने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। अदालत का मानना है कि दिल्ली-एनसीआर की हर महिला को रात 11 बजे भी सड़क या मेट्रो में सफर करते समय पूरी तरह सुरक्षित महसूस होना चाहिए। वहीं, पुलिस गश्त की प्रभावशीलता जांचने के लिए क्यूआर कोड ट्रैकिंग सिस्टम लागू करने का सुझाव भी दिया गया है, ताकि त्योहारों के सीजन में सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद रहे।