दिल्ली वोटर लिस्ट विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की तारीख कीाईं, लाखों वोटरों के पुनर्पंजीकरण पर जताई चिंता

दिल्ली की वोटर लिस्ट में हुए बड़े बदलावों और लाखों मतदाताओं के नाम हटने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई की तारीख 30 अक्टूबर से घटाकर अब 28 अक्टूबर कर दी है। यह फैसला वकील प्रशांत भूषण की उस अर्जी के बाद आया है, जिसमें उन्होंने बताया कि दावों और आपत्तियों को दर्ज करने की आखिरी तारीख 30 अक्टूबर ही है, जबकि अंतिम वोटर लिस्ट 4 दिसंबर को जारी होनी है। ऐसे में समय की कमी को देखते हुए कोर्ट ने मामले को जल्द सुनने का निर्णय लिया है।
पूरा विवाद चुनाव आयोग (ECI) द्वारा दिल्ली में चलाए गए 'विशेष गहन संशोधन' (SIR) को लेकर है। 31 अगस्त 2026 को जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया। दिल्ली के करीब 47.56 लाख मतदाताओं के नाम लिस्ट से हटा दिए गए, जो कि कुल वोटरों का लगभग 32.78% है। इन नामों को 'अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लिकेट' (ASDD) की श्रेणी में डालकर बाहर कर दिया गया है।
फॉर्म 6 और कानूनी पचड़े का बड़ा खतरा
इस कानूनी लड़ाई का मुख्य केंद्र चुनाव आयोग द्वारा पुनर्पंजीकरण के लिए 'फॉर्म 6' की अनिवार्यता है। याचिकाकर्ताओं, जिनमें अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी शामिल हैं, का तर्क है कि फॉर्म 6 केवल उन लोगों के लिए है जो पहली बार वोटर के तौर पर पंजीकरण करा रहे हैं। यदि पहले से पंजीकृत वोटर, जिसका नाम गलती से हटा दिया गया है, इस फॉर्म पर हस्ताक्षर करता है, तो वह तकनीकी रूप से यह घोषणा कर रहा है कि वह पहली बार आवेदन कर रहा है।
वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट को चेतावनी दी कि ऐसा करना मतदाताओं को 'जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950' की धारा 31 के तहत आपराधिक जोखिम में डाल सकता है। इस धारा के तहत गलत घोषणा करने पर एक साल की जेल या जुर्माने का प्रावधान है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि चुनाव आयोग हटाए गए वोटरों को वापस जोड़ने के लिए 'फॉर्म 8' या किसी विशेष फॉर्म का विकल्प दे, ताकि उन्हें पहली बार वोटर बनने का झूठा दावा न करना पड़े।
इससे पहले 22 सितंबर को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि वोटर लिस्ट संशोधन के दौरान मतदाताओं को भेजे गए नोटिस बहुत ही 'मैकेनिकल' तरीके से भेजे गए प्रतीत होते हैं। हालांकि कोर्ट का मानना है कि निष्पक्ष चुनाव के लिए वोटर लिस्ट का अपडेट होना जरूरी है, लेकिन करीब 47 लाख लोगों को एक साथ लिस्ट से बाहर करने की प्रक्रिया अब न्यायिक जांच के दायरे में है।