दिल्ली पुलिस के 60 दिनों के निषेधाज्ञा आदेशों पर सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा, सुरक्षा और अधिकारों पर बहस

सुप्रीम कोर्ट दिल्ली पुलिस द्वारा लगाए गए 60 दिनों के निषेधाज्ञा आदेशों की समीक्षा कर रहा है। जानें किन इलाकों में पाबंदी है और कोर्ट ने क्या कहा।

Kittu Kumari4 November 20262 min read0 viewsDelhi Local
दिल्ली पुलिस के 60 दिनों के निषेधाज्ञा आदेशों पर सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा, सुरक्षा और अधिकारों पर बहस

राजधानी में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए दिल्ली पुलिस द्वारा लगाए गए 60 दिनों के निषेधाज्ञा आदेश अब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हैं। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत जारी इन आदेशों की संवैधानिक वैधता की जांच तीन न्यायाधीशों की बेंच कर रही है, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना शामिल हैं। यह पूरा मामला जुलाई 2026 में हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद पुलिस द्वारा उठाए गए कदमों से जुड़ा है।

अदालत के समक्ष पेश आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने 20 अगस्त 2026 के आसपास छह विशिष्ट आदेश जारी किए थे। इनमें से एक प्रमुख आदेश 26 सितंबर से 24 नवंबर 2026 तक प्रभावी है। इस पाबंदी के तहत राजधानी के संवेदनशील इलाकों जैसे कनॉट प्लेस, तुगलक रोड, पार्लियामेंट स्ट्रीट, चाणक्यपुरी, बाराखंभा रोड, सफदरजंग एन्क्लेव और डिफेंस कॉलोनी में पांच या उससे अधिक लोगों के इकट्ठा होने, सार्वजनिक सभाओं, प्रदर्शनों और हथियार, लाठी या बैनर ले जाने पर पूरी तरह रोक लगाई गई है।

सुरक्षा बनाम विरोध का अधिकार

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सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार और जॉइंट कमिश्नर (क्राइम) सुरेंद्र कुमार ने तर्क दिया कि यातायात व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ये कड़े कदम उठाना बेहद जरूरी था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही पुलिस को इन आदेशों को औपचारिक रूप से रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया था, क्योंकि दस्तावेज़ों की कमी के कारण आम जनता के लिए इन आदेशों को चुनौती देना मुश्किल हो रहा था।

पुलिस ने कोर्ट को यह स्पष्ट किया कि जंतर मंतर को इन व्यापक प्रतिबंधों से बाहर रखा गया है, बशर्ते प्रदर्शनकारी लिखित अनुमति लें और शाम 5 बजे की समय सीमा का पालन करें।

4 नवंबर 2026 को समाप्त हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि हालांकि विरोध करने का अधिकार संवैधानिक रूप से सुरक्षित है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सार्वजनिक स्थानों पर कब्जा करने का अधिकार अनिश्चित काल के लिए हो। बेंच ने जोर दिया कि सार्वजनिक क्षेत्रों का प्रबंधन इस तरह होना चाहिए कि किसान, मजदूर और व्यापारियों जैसे विभिन्न समूहों को जगह मिले और साथ ही आर्थिक गतिविधियों में कोई बाधा न आए।

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट कॉकरोच जनता पार्टी, विभिन्न राजनीतिक संगठनों और व्यापारिक संघों द्वारा दायर याचिकाओं के एक समूह पर विचार कर रहा है, ताकि यह तय किया जा सके कि पुलिस की इन निवारक कार्रवाइयों का प्रक्रियात्मक और व्यावहारिक प्रभाव क्या रहा है।

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