मेट्रो शटडाउन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, अधिकारियों से मांगा जवाब

दिल्ली मेट्रो सेवाओं के अचानक बंद होने और अदालती आदेशों की अनदेखी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। 13 अक्टूबर 2026 को अदालत इस अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसमें वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों और परिवहन अधिकारियों को कटघरे में खड़ा किया गया है। दरअसल, 10 अक्टूबर को हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान मेट्रो सेवाओं में आई बाधाओं को लेकर यह कानूनी लड़ाई शुरू हुई है।
पूरे मामले की शुरुआत 9 अक्टूबर को हुई थी, जब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि दिल्ली में मेट्रो और ट्रेन सेवाओं को पूरी तरह से बंद नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने साफ कहा था कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं, लेकिन आम जनता को बेवजह परेशानी में नहीं डाला जाना चाहिए। इसके बावजूद, 10 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) और विभिन्न छात्र संगठनों द्वारा किए गए प्रदर्शनों के कारण मेट्रो सेवाओं में भारी व्यवधान और रद्दीकरण की खबरें सामने आईं।
अधिकारियों को नोटिस और कोर्ट की चेतावनी
11 अक्टूबर को हुई एक विशेष सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने पाया कि प्रथम दृष्टया अवमानना का मामला बनता है। इसके बाद कोर्ट ने केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार और DMRC की चेयरपर्सन डी. थारा को नोटिस जारी कर 13 अक्टूबर तक जवाब और अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया। यह याचिका वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर की गई थी।
दूसरी ओर, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि अधिकारियों ने 9 अक्टूबर के निर्देशों का पालन किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए 303 में से केवल 45 मेट्रो स्टेशनों को अस्थायी रूप से बंद किया गया था और 10 अक्टूबर की रात 10 बजे तक सभी स्टेशन फिर से खोल दिए गए थे।
कोर्ट ने अपनी पिछली सुनवाई में यह भी सख्त निर्देश दिए थे कि किसी भी व्यक्ति की अवैध हिरासत नहीं होनी चाहिए, आवाजाही सुचारू रहनी चाहिए और कानून-व्यवस्था की अनिवार्यताओं को छोड़कर इंटरनेट सेवाओं में कोई बाधा नहीं डाली जानी चाहिए। अब अदालत अधिकारियों द्वारा सौंपी गई रिपोर्टों की समीक्षा कर रही है।