'जब धांधली होती थी तब जीतती थी कांग्रेस', चुनाव प्रणाली पर सवाल उठाने पर सुधांशु त्रिवेदी का बड़ा हमला

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाली कांग्रेस पार्टी पर तीखा हमला बोला है। रविवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान त्रिवेदी ने कहा कि कांग्रेस अपनी चुनावी विफलताओं के लिए भारत की चुनाव प्रणाली को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकती। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस को तब जीत मिलती थी जब चुनावों में बूथ कैप्चरिंग, मतपत्रों की लूट और हिंसा जैसी अवैध गतिविधियां आम थीं।
सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि कांग्रेस अपनी बार-बार की हार से निराश होकर चुनावी प्रणाली की वैधता पर सवाल उठाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने याद दिलाया कि 2014 में बनी सरकार भारत के इतिहास में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी जिसे स्पष्ट बहुमत मिला था, लेकिन अब कांग्रेस इसे 'अवैध' बताने की कोशिश कर रही है।
पारदर्शिता से घबराई कांग्रेस: बीजेपी का आरोप
बीजेपी सांसद ने कांग्रेस के इतिहास पर तंज कसते हुए कहा कि जब तक चुनावों में सीसीटीवी नहीं थे, स्वतंत्र मीडिया नहीं था और बूथ कैप्चरिंग जैसी घटनाएं होती थीं, तब तक कांग्रेस सत्ता में बनी रही। उन्होंने दावा किया कि जैसे ही चुनावी प्रक्रिया कानूनी और पारदर्शी हुई, सत्ता कांग्रेस के हाथों से फिसलने लगी। त्रिवेदी ने कहा कि सत्ता खोने की यही हताशा अब उनके बयानों में दिख रही है।
उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की टिप्पणियों पर भी सवाल उठाए और कहा कि देश की चुनाव प्रणाली पर सवाल करने से पहले कांग्रेस को अपने भीतर की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की जांच करनी चाहिए। उन्होंने इसे 140 करोड़ भारतीयों के जनादेश का अपमान बताते हुए कांग्रेस से माफी की मांग की।
सांसद ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात और ओडिशा जैसे राज्यों में कांग्रेस का आधार पूरी तरह खत्म हो चुका है। उन्होंने तंज कसा कि जो पार्टी 228 सीटों के प्रभाव वाले राज्यों में शून्य के करीब पहुंच गई है, वह 300 में से 272 सीटें जीतने का सपना कैसे देख सकती है?
हिंसा के उदाहरण देते हुए त्रिवेदी ने बिहार के पुराने चुनावों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि 1985 और 1990 के बिहार चुनावों में दर्जनों हत्याएं हुईं और 1995 में तो हत्याओं के कारण मतदान को चार बार रोकना पड़ा। उन्होंने यहां तक दावा किया कि 1989 में अमेठी में राजीव गांधी के चुनाव के दौरान भी गोलियां चली थीं।
यह पूरा विवाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) को लेकर चल रही राजनीतिक खींचतान के बीच सामने आया है, जिसमें विपक्षी दल अनियमितताओं का आरोप लगा रहे हैं।