लोकतंत्र की हत्या का कार्यालय: कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगाया गंभीर आरोप

नई दिल्ली। चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर राजनीतिक विवाद बढ़ गया है। कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने सहयोगियों को गुमराह किया और कार्यपालिका के साथ मिलकर एक समानांतर तंत्र चलाया। प्रेस को संबोधित करते हुए सिंघवी ने The Indian Express की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि दो चुनाव आयुक्तों ने विशेष गहन संशोधन (SIR) प्रक्रिया से जुड़े फैसलों पर कई बार आपत्ति जताई थी। सिंघवी ने चुनाव आयोग को नियंत्रित करने वाले ऐतिहासिक न्यायिक मापदंडों की ओर ध्यान आकर्षित किया और बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने दशकों पहले यह स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग एक बहुसंख्यकवादी संस्था है, न कि किसी एक सर्वोच्च प्राधिकारी के अधीन काम करने वाली संस्था।
अभिषेक मनु सिंघवी ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने साथी आयुक्तों को दरकिनार कर दिया और एकतरफा काम किया। उन्होंने कहा कि आज के खुलासे से हम समझते हैं कि माननीय मुख्य चुनाव आयुक्त ने न केवल देश को गुमराह किया, बल्कि उन्होंने लंबे समय से देश के संवैधानिक मूल्यों को नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने अपने ही सहयोगियों को गुमराह किया और चुनाव आयोग का अपहरण करके अपने साथियों को सेवा करने से दूर कर दिया। सिंघवी ने कहा कि यह आंतरिक बुलडोजर का एक उदाहरण है। उन्होंने 30 साल पुराने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि सभी चुनाव आयुक्तों के पास निर्णय लेने में अपनी बात कहने का अधिकार होना चाहिए और मुख्य चुनाव आयुक्त अन्य चुनाव आयुक्तों से ऊपर नहीं हैं, बल्कि वे समानों में पहले हैं।
सिंघवी ने आयोग के भीतर दस महीने की अवधि के दौरान दर्ज किए गए आंतरिक विरोध का ब्योरा देते हुए चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू द्वारा मतदाता पंजीकरण दस्तावेजों में किए गए बदलावों को लेकर दर्ज लिखित आपत्तियों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त को इस अर्थ में श्रेष्ठ माना जाता है कि उनका शब्द अंतिम है, तो यह अन्य आयुक्तों को गैर-कार्यात्मक या केवल सजावटी बना देगा। इन लोगों ने 10 महीने में 14 बार लिखित विरोध और असहमति व्यक्त की। 13 अगस्त को संधू साहब ने लिखा कि फॉर्म 6 में यह गड़बड़ी और बदलाव अनधिकृत और अवैध है। जोशी साहब और संधू साहब दोनों ने फॉर्म 6 का औपचारिक रूप से लिखित विरोध किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला और पूरी तरह से चुप्पी रही।
सिंघवी ने पश्चिम बंगाल के मामले में मतदाता हटाने की चुनौतियों से जुड़े विरोधाभासी आंकड़ों पर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल के मामले में 38 लाख में से 20-23 लाख लोगों के नाम हटाए गए थे, जिनके खिलाफ अपील की गई थी। लेकिन वह आंकड़ा जो आपको नहीं पता, वह यह है कि चुनाव आयोग द्वारा 16 लाख अपीलें की गईं। इससे पहले विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए प्रस्ताव पेश किए थे। अप्रैल 2026 में कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा था कि 73 विपक्षी राज्यसभा सांसदों ने साबित कदाचार के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए एक नया नोटिस प्रस्तुत किया था।