सुकेश चंद्रशेखर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, जज बनकर फर्जीवाड़ा करने की सजा पर रोक लगाने से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने जज बनकर फर्जीवाड़ा करने वाले सुकेश चंद्रशेखर की सजा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। पूरी खबर यहाँ पढ़ें।

जज बनकर फर्जीवाड़ा करने और न्यायिक अधिकारी को प्रभावित करने की कोशिश करने वाले कुख्यात ठग सुकेश चंद्रशेखर की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने सुकेश चंद्रशेखर की सजा और दोषसिद्धि (conviction) पर रोक लगाने की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया, जिसमें सुकेश को राहत देने से इनकार किया गया था। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की और याचिका को खारिज कर दिया।
क्या है पूरा मामला और क्यों लगी सजा?
सुकेश चंद्रशेखर को चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत ने 20 अगस्त को दोषी करार दिया था। उस पर आईपीसी की धारा 170, 189 और 507 के तहत मामला दर्ज था, जिसमें लोक सेवक का रूप धारण करना, धमकी देना और गुमनाम संचार के जरिए आपराधिक धमकी देना शामिल है। मामला तब सामने आया जब 2017 के एक भ्रष्टाचार मामले में पुलिस हिरासत में मौजूद सुकेश ने एक कांस्टेबल का मोबाइल फोन हासिल किया। आरोप है कि उसने उस फोन के जरिए एक न्यायिक अधिकारी से संपर्क किया और पहले खुद को सुप्रीम कोर्ट के एक जज का निजी सचिव बताया और बाद में खुद को जज बताकर अधिकारी पर दबाव डाला ताकि उसे अपने मामले में अनुकूल आदेश मिल सकें।
सुकेश की ओर से पेश वरिष्ठ वकील शोएब आलम ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने सुकेश के खिलाफ 31 लंबित आपराधिक मामलों का जिक्र करते हुए उसके चरित्र के बारे में प्रतिकूल टिप्पणियां की हैं, जबकि वह उनमें से किसी में भी दोषी साबित नहीं हुआ है। वकील का तर्क था कि ऐसी टिप्पणियां अन्य लंबित मामलों की सुनवाई को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को पर्याप्त नहीं माना और कहा कि हाई कोर्ट के आदेश में कानून की कोई गलती नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सुकेश के खिलाफ चल रहे अन्य सभी आपराधिक ट्रायल स्वतंत्र रूप से और कानून के अनुसार अपनी योग्यता के आधार पर आगे बढ़ेंगे। गौरतलब है कि ट्रायल कोर्ट ने सुकेश की इस हरकत को 'संस्थागत अवहेलना' करार देते हुए उसकी कड़ी आलोचना की थी। हाई कोर्ट ने भी उसकी याचिका खारिज करते हुए कहा था कि उसकी आपत्तियां अपील सुनने वाली अदालत द्वारा देखी जानी चाहिए, न कि सजा पर रोक लगाने के स्तर पर।