रोड रेज केस: पत्रकार के डिजिटल रिकॉर्ड मांगने पर सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस को फटकारा, कहा- यह 'ओवरकिल' है

एक सड़क विवाद यानी रोड रेज मामले की जांच के नाम पर पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के महीनों पुराने डिजिटल रिकॉर्ड मांगने की कोशिश को सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह गलत ठहराया है। कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस की इस कार्रवाई को 'ओवरकिल' बताते हुए स्पष्ट किया कि जांच एजेंसियों को अपराध की जांच करने का हक है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे किसी व्यक्ति के निजी डिजिटल जीवन में इस तरह दखल दें।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची की बेंच ने गाजियाबाद पुलिस द्वारा जारी उस नोटिस को रद्द कर दिया, जिसमें पत्रकार के कॉल रिकॉर्ड और अन्य डिजिटल डेटा की मांग की गई थी। हैरानी की बात यह थी कि पुलिस ने कथित घटना से कई महीने पहले तक का डेटा मांगा था। कोर्ट ने उपाध्याय को गिरफ्तारी से मिली अंतरिम सुरक्षा को भी जारी रखा है, हालांकि रोड रेज मामले से जुड़े अन्य मुद्दों पर फैसला अभी खुला रखा गया है।
निजता के अधिकार और जांच के बीच संतुलन जरूरी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की मंशा पर सवाल उठाते हुए पूछा कि एक मामूली रोड रेज मामले की जांच के लिए इतने व्यापक डिजिटल डेटा की जरूरत क्यों पड़ी? कोर्ट ने जोर देकर कहा कि राज्य की जांच करने की शक्ति और व्यक्ति के निजता के अधिकार के बीच एक संतुलन होना चाहिए, खासकर तब जब संबंधित व्यक्ति एक खोजी पत्रकार (Investigative Journalist) हो।
अदालत ने कहा, "अगर हम जांच के लिए पूरी छूट दे देंगे, तो एक खोजी पत्रकार के अधिकारों का क्या होगा?" कोर्ट ने यह भी साफ किया कि वह आईटी एक्ट के तहत पुलिस की वैधानिक शक्तियों पर सवाल नहीं उठा रहा है, बल्कि जिस तरीके से इन शक्तियों का इस्तेमाल किया गया, उस पर आपत्ति जताई है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने पुलिस की कार्रवाई का बचाव करते हुए आईटी नियमों का हवाला दिया, लेकिन कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया। बेंच ने सवाल किया कि जब घटना अगस्त की है, तो जून से ही कॉल रिकॉर्ड क्यों मांगे जा रहे हैं? कोर्ट ने टिप्पणी की कि अगर मामला किसी बड़ी साजिश का होता तो यह समझ आता, लेकिन रोड रेज केस में चार महीने का डेटा मांगना तर्कहीन है।