जंतर मंतर पर प्रदर्शन की पाबंदी: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'सुने जाने' के अधिकार को तकनीक के नजरिए से भी देखें

देश की राजधानी दिल्ली के दिल में बसे जंतर मंतर को विरोध प्रदर्शन स्थल के रूप में डी-नोटिफाई करने के पुलिस के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने एक दिलचस्प टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि आज के डिजिटल युग में किसी प्रदर्शनकारी के 'सुने जाने' के अधिकार को केवल भौगोलिक स्थिति से नहीं, बल्कि तकनीक के नजरिए से भी देखा जाना चाहिए। यह मामला तब सामने आया जब वकील स्वाति मलिक ने दिल्ली पुलिस के इस फैसले को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी।
सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची की बेंच ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि जंतर मंतर देश के प्रशासनिक केंद्रों के करीब है, इसलिए वहां प्रदर्शन करने से सरकार तक अपनी बात पहुंचाना आसान होता है। याचिका में कहा गया कि इस स्थल को हटाना विरोध करने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
तकनीक और विरोध प्रदर्शन पर कोर्ट की राय
जस्टिस बागची ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि "सुने जाने" (to be heard) शब्द का अर्थ अब बदल गया है। उन्होंने संकेत दिया कि आज के दौर में तकनीक इतनी उन्नत है कि किसी विरोध प्रदर्शन का असर केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह सत्ता के केंद्रों के कितने करीब हो रहा है। डिजिटल माध्यमों ने अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के तरीके बदल दिए हैं, इसलिए भौगोलिक दूरी अब प्रदर्शन की ताकत को कम नहीं करती।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि याचिका में उठाए गए सवाल कानूनी जांच के योग्य हैं, जिसके बाद केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा गया।
इसके अलावा, कोर्ट ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी अन्य याचिकाओं पर भी सुनवाई की। इनमें पत्रकारों और वकीलों के साथ मारपीट, उत्पीड़न, अवैध हिरासत और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को जब्त किए जाने के गंभीर आरोप लगाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी मामलों में केंद्र से विस्तृत जवाब मांगा है और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को निर्देश दिया है कि वे प्रदर्शनों से जुड़े सभी सीसीटीवी फुटेज और डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखें।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी शांतिपूर्ण और निहत्थे व्यक्ति की अवैध हिरासत नहीं होनी चाहिए। अब केंद्र सरकार इन सभी याचिकाओं पर एक समेकित जवाब दाखिल करेगी।