कोर्टरूम वीडियो के गलत इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, MeitY को पॉलिसी में जोड़ने को कहा दंड प्रावधान
सुप्रीम कोर्ट ने MeitY से कहा कि कोर्ट की कार्यवाही के वीडियो का अनधिकृत इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के प्रावधान पॉलिसी में जोड़ें।

सुप्रीम कोर्ट ने अदालती कार्यवाही के वीडियो और ऑडियो रिकॉर्डिंग के अनधिकृत प्रसार पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को निर्देश दिया है कि वह अपनी प्रस्तावित पॉलिसी में उन लोगों के खिलाफ दंड के प्रावधान शामिल करे, जो कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन कर वीडियो शेयर करते हैं। यह मामला लाइव-स्ट्रीमिंग, रिकॉर्डिंग और अदालती कार्यवाही के प्रकाशन से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आया।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि विभिन्न हितधारकों से मिले सुझाव MeitY को भेज दिए गए हैं। मंत्रालय अब एक ऐसी पॉलिसी तैयार कर रहा है, जो कोर्टरूम रिकॉर्डिंग्स के व्यावसायिक शोषण और भ्रामक प्रसार जैसी समस्याओं को हल कर सके। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि मौजूदा निर्देशों का उल्लंघन करने वाले कंटेंट को हटाने (take-down orders) के लिए भी विचार किया जाना चाहिए।
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर मॉनिटाइजेशन और सुरक्षा पर चर्चा
कोर्ट में सुनवाई के दौरान कुछ महत्वपूर्ण सुझाव और चिंताएं भी सामने आईं:
- सत्यापित रिपॉजिटरी: वकील प्रशांत भूषण ने सुझाव दिया कि आधिकारिक वेबसाइटों पर रिकॉर्डिंग्स का एक प्रमाणित संग्रह होना चाहिए, जिसमें वॉटरमार्क और क्रिप्टोग्राफिक सिग्नेचर हों, ताकि सामग्री की सत्यता सुनिश्चित की जा सके।
- डाउनलोडिंग पर रोक: जस्टिस बागची ने बताया कि हाईकोर्ट के यूट्यूब चैनलों से क्लिप डाउनलोड करने को रोकने जैसे प्रशासनिक उपायों पर विचार किया जा रहा है, हालांकि इसे पूरी तरह लागू करना एक चुनौती है।
- अनुमति की अनिवार्यता: कोर्ट ने संकेत दिया कि आधिकारिक रिकॉर्डिंग से क्लिप निकालने के लिए सुप्रीम कोर्ट के महासचिव की अनुमति लेनी होगी और उपयोग के उद्देश्य की जांच भी की जाएगी।
जहाँ प्रशांत भूषण ने चिंता जताई कि ऐसे प्रतिबंध पत्रकारिता को प्रभावित कर सकते हैं, वहीं सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि यूट्यूबर्स जो इस तरह के कंटेंट से पैसे कमा रहे हैं, वे जरूरी नहीं कि किसी जनहित की सेवा कर रहे हों।
गौरतलब है कि 24 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि बिना अनुमति के न्यायिक कार्यवाही की रिकॉर्डिंग को सोशल मीडिया या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड, संशोधित या स्टोर नहीं किया जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि ये निर्देश समाचार रिपोर्टिंग पर लागू नहीं होंगे। यह पूरी कार्रवाई हर्षिता ग्रोवर द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) के बाद हो रही है, जिसमें डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कोर्ट वीडियो की क्लिपिंग और मॉनिटाइजेशन को विनियमित करने के लिए दिशा-निर्देश मांगे गए थे।