सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: परिसर के पास हटी BNSS धारा 163 की पाबंदियां

देश की सबसे बड़ी अदालत ने रविवार, 11 अक्टूबर 2026 को एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट परिसर के आसपास लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत लगाए गए निषेधाज्ञा आदेशों को तत्काल हटाने का आदेश दिया है। जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने स्पष्ट किया कि न्याय तक पहुंच में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए और शांतिपूर्ण व निहत्थे प्रदर्शनकारियों को अवैध रूप से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए।
यह अदालती हस्तक्षेप 10 अक्टूबर 2026 को हुई सरकारी सख्ती और व्यापक प्रतिबंधों के बाद आया है। इस कार्रवाई के दौरान कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं अभिजीत डिपके, आशुतोष रंका और सौरव दास को हिरासत में लिया गया था। हालांकि, 11 अक्टूबर को इन नेताओं को इस शर्त पर रिहा कर दिया गया कि वे एक साल तक शांति व्यवस्था भंग नहीं करेंगे और इसके लिए उन्होंने जमानत बांड पर हस्ताक्षर किए।
मेट्रो और इंटरनेट सेवाएं रहेंगी सामान्य
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने धारा 163 के कार्यान्वयन के संबंध में निर्देश लेने के लिए समय मांगा। वहीं, सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायण ने अदालत को बताया कि प्रतिबंधों की वजह से वकीलों को भी कोर्ट परिसर में प्रवेश करने से रोका गया था। एडवोकेट कैलाश मोरे ने जोर देकर कहा कि कानून के दायरे में रहकर और बिना हथियारों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है।
अदालत ने न केवल परिसर के पास की पाबंदियां हटाने को कहा, बल्कि यह भी निर्देश दिया कि राजधानी में लोगों की आवाजाही सुगम रहे, इसके लिए मेट्रो, रेल और इंटरनेट सेवाएं सामान्य रूप से चालू रहनी चाहिए। कोर्ट वर्तमान में कई याचिकाओं पर विचार कर रहा है, जिसमें एडवोकेट शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की अवमानना याचिका और सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका शामिल है। इन याचिकाओं में मेट्रो स्टेशनों को बंद करने के पिछले आदेशों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।
बता दें कि CJP के आंदोलन के सिलसिले में दिल्ली पुलिस ने अब तक 20 एफआईआर दर्ज की हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना याचिका पर नोटिस जारी किया है और यह भरोसा दिलाया है कि जनता को किसी भी तरह की असुविधा न हो, इसके लिए सभी संबंधित पक्षों की बात सुनी जाएगी।