सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: चिड़ियाघरों में लोगों को बाड़े में कूदने से रोकने की याचिका खारिज

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें चिड़ियाघरों के जानवरों के बाड़ों में लोगों के कूदने से रोकने के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी। यह याचिका आत्महत्या करने के कथित प्रयासों के मामलों से जुड़ी हुई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस संबंध में पहले से ही पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा कि हर किसी को कानून के अनुसार काम करना चाहिए। याचिका में जुलाई 2020 के दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें देश भर में चिड़ियाघरों के बाड़ों में लोगों के घुसने की घटनाओं पर अधिकारियों की निष्क्रियता के आरोप वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया गया था। हालांकि उच्च न्यायालय ने तब याचिकाकर्ता को संबंधित अधिकारियों के पास अपनी बात रखने की अनुमति दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को साल 2020 में अपने हाथ में लिया था और केंद्र सरकार से मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 की धारा 115 और तत्कालीन भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की धारा 309 के बीच आत्महत्या के प्रयासों से जुड़े तालमेल पर जवाब मांगा था। मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम की धारा 115 आत्महत्या के प्रयास के मामलों में अत्यधिक तनाव का अनुमान लगाती है और यह प्रावधान करती है कि ऐसे व्यक्तियों पर आईपीसी के तहत मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए या उन्हें सजा नहीं दी जानी चाहिए। इसके साथ ही यह सरकार से ऐसे लोगों को देखभाल, उपचार और पुनर्वास प्रदान करने की मांग करती है। याचिकाकर्ता ने बाघ और शेर के बाड़ों में लोगों के घुसने की कुछ ऐसी घटनाओं का हवाला दिया था जिनके परिणाम स्वरूप मौतें भी हुई थीं और याचिका में चिड़ियाघर के अधिकारियों द्वारा सुरक्षा के अपर्याप्त उपायों का आरोप लगाया गया था।