महिला सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, शिक्षण संस्थानों के पास बढ़ानी होगी दिल्ली पुलिस की गश्त

देश की राजधानी और आसपास के इलाकों में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। हाल ही में हुई दुष्कर्म की घटनाओं पर संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने दिल्ली पुलिस और प्रशासन को सुरक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए एक विस्तृत छह-सूत्रीय योजना लागू करने का आदेश दिया है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने साफ किया है कि स्कूलों, कॉलेजों, यूनिवर्सिटी और कोचिंग सेंटरों के आसपास बीट पेट्रोलिंग को तुरंत बढ़ाया जाए ताकि अपराधी किसी भी तरह की हिमाकत न कर सकें।
सुनवाई के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि साल 2020 की कैग (CAG) रिपोर्ट के मुताबिक, जांच और गश्त के लिए तैनात पुलिसकर्मियों की संख्या में 39 प्रतिशत की कमी है। इसी कमी को देखते हुए कोर्ट ने 'ब्रोकन विंडोज' थ्योरी का जिक्र करते हुए कहा कि नागरिक सुविधाओं की अनदेखी अपराधियों को बढ़ावा देती है, इसलिए प्रशासन को बुनियादी ढांचे और सफाई पर भी ध्यान देना होगा। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर और दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव को चेतावनी दी है कि यदि इन निर्देशों का पालन नहीं हुआ, तो उन्हें व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
परिवहन और सार्वजनिक स्थानों पर होगी कड़ी निगरानी
सुप्रीम कोर्ट ने केवल गश्त बढ़ाने की बात नहीं की, बल्कि सार्वजनिक परिवहन में सफर करने वाली महिलाओं की सुरक्षा के लिए कड़े नियम तय किए हैं। अब बसों, ऑटो-रिक्शा और ओला-उबर जैसे ऐप-आधारित कैब सेवाओं के ड्राइवरों और सहायकों का अनिवार्य सत्यापन (Verification) किया जाएगा। साथ ही, वाहनों के अंदर उनकी सत्यापित पहचान आईडी प्रदर्शित करना जरूरी होगा।
इसके अलावा, कोर्ट ने प्रशासन को निम्नलिखित कदम उठाने के निर्देश दिए हैं:
- अवैध शराब दुकानों की पहचान कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए और वहां भीड़ को हटाया जाए।
- सड़कों पर खड़े उन भारी वाहनों को हटाया जाए जो विजिबिलिटी कम करते हैं या जहाँ संदिग्ध लोग शरण लेते हैं।
- CCTV नेटवर्क और पुलिस गश्त की रियल-टाइम निगरानी के लिए सेंट्रलाइज्ड कमांड सेंटर बनाए जाएं।
- जन जागरूकता बढ़ाने के लिए पुलिस और स्थानीय प्रशासन आम नागरिकों के साथ बैठकें करें।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस को अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कानून के दायरे में रहकर ही करना चाहिए और किसी भी तरह की मनमानी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। साथ ही, पुलिसकर्मियों की ट्रेनिंग में 'प्रिवेंशन-ओरिएंटेड पुलिसिंग' को शामिल करने की सलाह दी गई है। मुख्य सचिव और पुलिस कमिश्नर को अब मौजूदा बुनियादी ढांचे और इमरजेंसी रिस्पांस प्रोटोकॉल पर एक संयुक्त हलफनामा दाखिल करना होगा। इस मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 को तय की गई है।