शिक्षक भर्ती में ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों की अनदेखी पर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार को फटकारा

देश की सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली सरकार की शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में ट्रांसजेंडर समुदाय की अनदेखी पर गहरी नाराजगी जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर सवाल उठाए हैं कि भर्ती विज्ञापनों में पदों को केवल 'पुरुष' या 'महिला' श्रेणियों में ही क्यों बांटा गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल ऑनलाइन आवेदन पोर्टल पर 'तीसरा लिंग' (Third Gender) का विकल्प दे देना काफी नहीं है, जब तक कि मूल भर्ती विज्ञापन में उनके लिए जगह न हो।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति भी इंसान हैं और उन्हें समान अवसर मिलने चाहिए। अदालत ने इस मामले को संवेदनशीलता से देखने की जरूरत बताई और सरकार से पूछा कि आखिर किस आधार पर केवल दो ही जेंडर श्रेणियों के तहत विज्ञापन जारी किए जा रहे हैं।
15 दिनों में जवाब तलब, केंद्र सरकार को भी नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने अब दिल्ली सरकार और दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (DSSSB) को 15 दिनों के भीतर एक औपचारिक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। सरकार को यह बताना होगा कि जेंडर-बाइनरी (केवल स्त्री-पुरुष) वाले नोटिफिकेशन का कानूनी आधार क्या है और सार्वजनिक रोजगार में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को शामिल करने के लिए प्रशासन की क्या योजना है।
यह कानूनी लड़ाई जेन कौशिक जैसी याचिकाकर्ताओं के माध्यम से लड़ी जा रही है, जो एक ट्रांसवुमन हैं और पहले ही शिक्षक पदों के लिए आवेदन करने की अनुमति पा चुकी हैं। इस मामले में प्रवीन सिंह ने भी याचिका दायर की है, ताकि एक व्यापक और समावेशी भर्ती नीति बनाई जा सके।
सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि ऑनलाइन एप्लीकेशन रजिस्ट्रेशन सिस्टम (OARS) को अपडेट कर दिया गया है और उसमें तीसरे लिंग का विकल्प मौजूद है। हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को पर्याप्त नहीं माना और कहा कि समस्या सिस्टम के अपडेट में नहीं, बल्कि भर्ती की बुनियादी नीति और विज्ञापनों में है। कोर्ट ने इस संबंध में केंद्र सरकार, शिक्षा निदेशालय और समाज कल्याण विभाग को भी नोटिस जारी किए हैं।