शिक्षकों की भर्ती में जेंडर आधारित अलग नोटिफिकेशन क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से पूछा- शिक्षकों की भर्ती में महिला और पुरुष के लिए अलग नोटिफिकेशन क्यों? ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों का क्या होगा?

Kittu Kumari23 October 20262 min read0 viewsDelhi Local
शिक्षकों की भर्ती में जेंडर आधारित अलग नोटिफिकेशन क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से मांगा जवाब

दिल्ली में सरकारी शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। अदालत ने दिल्ली सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (DSSSB) द्वारा पुरुष और महिला शिक्षकों के लिए अलग-अलग रिक्तियों के नोटिफिकेशन जारी करने का कानूनी आधार क्या है। साथ ही, कोर्ट ने यह भी पूछा है कि सार्वजनिक रोजगार में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को शामिल करने के लिए सरकार की क्या योजना है।

यह मामला जेन कौशिक और प्रवीण सिंह द्वारा दायर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आया। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने 16 अक्टूबर को एक आदेश जारी करते हुए सरकार से छह सवालों के जवाब मांगे हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामला मुख्य रूप से रिक्तियों के नोटिफिकेशन में 'थर्ड जेंडर' (तीसरे लिंग) को शामिल न किए जाने से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को 15 दिनों के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।

भर्ती नियमों और संवैधानिक प्रावधानों पर सवाल

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अदालत ने दिल्ली सरकार से उन भर्ती नियमों की पहचान करने को कहा है, जिनके तहत DSSSB नोटिफिकेशन जारी करता है। कोर्ट जानना चाहता है कि क्या कोई ऐसा संवैधानिक प्रावधान, कानून या सर्विस रूल है, जो शिक्षकों की रिक्तियों को जेंडर के आधार पर अलग-अलग विज्ञापित करने की अनिवार्यता बनाता है। अगर ऐसा कोई नियम नहीं है, तो सरकार को इस वर्गीकरण के पीछे के तर्क को समझाना होगा।

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पूछा है कि क्या सरकार भविष्य के नोटिफिकेशन में ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को शामिल करने का प्रस्ताव रखती है और यदि हाँ, तो उन्हें सार्वजनिक रोजगार में शामिल करने के लिए क्या सुविधाएं या प्रावधान किए जाएंगे।

प्रवीण सिंह की याचिका में ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों के लिए आयु सीमा में छूट का मुद्दा उठाया गया था। इस पर शीर्ष अदालत ने सवाल किया कि दिल्ली हाई कोर्ट ने समुदाय द्वारा झेले जाने वाले "सामाजिक-आर्थिक भेदभाव" को देखते हुए नियमों के तहत आयु में छूट देने की अपनी शक्तियों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया। अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर को होगी।

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