सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम: स्टूडेंट प्रोटेस्ट पर पुलिस ज्यादती की जांच के लिए बनाई हाई-पावर्ड कमेटी

20 अगस्त 2026 को भारत के सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर और देश भर में अन्य जगहों पर प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर पुलिस की ज्यादती के आरोपों की जांच के लिए एक पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड कमेटी का औपचारिक रूप से गठन किया है। ये प्रदर्शन मुख्य रूप से कथित NEET परीक्षा पेपर लीक चिंताओं और राष्ट्रीय परीक्षा प्रणाली से जुड़े बड़े मुद्दों की वजह से हुए थे। यह न्यायिक कदम मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच द्वारा सुनी गई याचिकाओं के बाद उठाया गया है, जो 20 जुलाई 2026 को हुए स्टूडेंट-लेड संसद मार्च की घटनाओं से जुड़ी हैं।
- सुप्रीम कोर्ट ने स्टूडेंट प्रोटेस्ट में पुलिस ज्यादती की जांच के लिए पांच सदस्यीय कमेटी बनाई।
- यह कमेटी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में काम करेगी।
- कमेटी लाठीचार्ज, पेलेट गन, महिला प्रदर्शनकारियों पर हिंसा और मेडिकल सहायता की जांच करेगी।
- दिल्ली पुलिस ने 17 अगस्त 2026 के हलफनामे में अत्यधिक बल प्रयोग से इनकार किया है।
कमेटी के सदस्य और जांच का दायरा
इस कमेटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं। इस पैनल में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रवि शंकर झा, दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस शालिंदर कौर, सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के रिटायर्ड डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस डॉ. एल.आर. बिश्नोई शामिल हैं। पैनल के अधिकार क्षेत्र में कथित तौर पर पेलेट गन, इलेक्ट्रिक बाटन, लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल की जांच शामिल है। इसके अलावा, महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा, पुलिस निगरानी के तरीकों, और मेडिकल सहायता व पीड़ित मुआवजे की पर्याप्तता की जांच भी इसमें शामिल है। इसके साथ ही, कमेटी पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के संबंध में अधिकारियों के काउंटर-आरोपों की भी समीक्षा करेगी। कोर्ट ने 20 जुलाई की घटनाओं के सभी प्रासंगिक वीडियो और सीसीटीवी फुटेज जमा करने का आदेश दिया है।
दिल्ली पुलिस का पक्ष और कोर्ट की टिप्पणियां
17 अगस्त 2026 को दाखिल 42-पेज के हलफनामे में दिल्ली पुलिस ने अत्यधिक बल के इस्तेमाल से इनकार किया। पुलिस का कहना था कि संसद की ओर मार्च करते समय जब प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ने की कोशिश की, तब पुलिस को दखल देना पड़ा। केंद्र की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने हिंसा के लिए जिम्मेदार 2,800 से अधिक लोगों की पहचान 'असामाजिक तत्वों' के रूप में की है। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार को आंदोलन के दावों के आधार पर कमजोर नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि एफआईआर रद्द करने के लिए 'आपराधिक इतिहास' (criminal antecedents) का पैमाना केवल गंभीर अपराधों में शामिल लोगों पर लागू होगा। कोर्ट ने 1 अगस्त को कमेटी का प्रस्ताव रखा था और 18 अगस्त को इसके दायरे पर सुझाव मांगे थे, और अब आधिकारिक तौर पर इस पैनल को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ इस्तेमाल किए गए क्राउड-कंट्रोल उपायों की आनुपातिकता (proportionality) का मूल्यांकन करने का काम सौंपा है। प्रदर्शनकारियों ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की भी मांग की है।