रामलीला मैदान बना प्रोटेस्ट साइट, लेकिन 2026 तक बुकिंग मिलना होगा मुश्किल

दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के लिए जंतर मंतर की जगह अब रामलीला मैदान को मुख्य केंद्र बनाया गया है, लेकिन हकीकत यह है कि आम जनता के लिए यहाँ जगह पाना लगभग नामुमकिन हो गया है। रामलीला मैदान विरोध प्रदर्शन के लिए तो घोषित है, लेकिन अधिकारियों के मुताबिक साल 2026 के अंत तक यह मैदान लगभग पूरी तरह बुक हो चुका है।
करीब 12 एकड़ में फैला यह मैदान, जहाँ 50,000 लोग समा सकते हैं, अक्टूबर और नवंबर के त्योहारों और कार्यक्रमों की वजह से पूरी तरह भरा हुआ है। चौंकाने वाली बात यह है कि साल 2026 के अंत तक केवल तीन तारीखें—29, 30 और 31 दिसंबर—ही खाली बची हैं। हालांकि, मैदान का एक छोटा हिस्सा अभी उपलब्ध है, लेकिन वहां केवल 150 लोग ही इकट्ठा हो सकते हैं, जो किसी बड़े आंदोलन के लिए नाकाफी है।
महंगी बुकिंग और ट्रैफिक की चुनौती
यह पूरा बदलाव दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार के 11 अक्टूबर के आदेश के बाद आया है, जिसमें गृह मंत्रालय की समिति की सिफारिश पर जंतर मंतर को डी-नोटिफाई कर रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और ईस्ट दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड को विकल्प के तौर पर चुना गया। लेकिन इस व्यवस्था को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।
मैदान की बुकिंग एमसीडी के हॉर्टिकल्चर विभाग के जरिए होती है, जिसके लिए दिल्ली पुलिस से एनओसी (NOC) लेना अनिवार्य है। पूरे मैदान को बुक करने के लिए करीब 1.21 लाख रुपये का भुगतान करना पड़ता है, जिसमें 50,000 रुपये प्रतिदिन का किराया और 55,000 रुपये सिक्योरिटी डिपॉजिट शामिल है।
इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए आम आदमी पार्टी के दिल्ली अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने इसे 'धोखा' करार दिया है। उनका कहना है कि इतनी भारी कीमत और सीमित उपलब्धता के कारण आम आदमी के लिए यहाँ प्रदर्शन करना संभव नहीं है। वहीं, चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) और ऑल इंडिया मोटर एंड गुड्स ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (AIMGTA) ने चेतावनी दी है कि रामलीला मैदान में भीड़ बढ़ने से शहर के ट्रैफिक और आपातकालीन सेवाओं पर बुरा असर पड़ेगा।
फिलहाल, जंतर मंतर को प्रोटेस्ट साइट से हटाने के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं लंबित हैं, जिस पर आगे की सुनवाई होनी तय है।