दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज में सोमवार 24 अगस्त को विवेकानंद स्टडी सर्किल द्वारा 'स्वा का बोध' विषय पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। डॉ. गौरव त्रिपाठी द्वारा संचालित इस कार्यक्रम में भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपराओं, शिक्षा, दर्शन, इतिहास और आत्म-साक्षात्कार के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई। इस कार्यक्रम में छात्रों को अपनी जड़ों से जुड़ने और भारतीय संस्कृति के महत्व को समझने के लिए प्रेरित किया गया।
स्वागत संबोधन में
प्रो. दर्शन पांडे ने भारतीय संस्कृति को जीवन शैली से बढ़कर बताया और कहा कि यह व्यक्तियों को उनके अस्तित्व और जीवन के उद्देश्य को समझने की दृष्टि प्रदान करती है। मुख्य वक्ता
मिथिलेश कुमार ने महाभारत के प्रसंगों का हवाला देते हुए
'स्वा' (स्वयं) की अवधारणा को समझाया और कहा कि जीवन की चुनौतियों से पार पाने के लिए धैर्य जरूरी है। उन्होंने
सत्व, शील, ज्ञान और शक्ति जैसे जीवन मूल्यों पर चर्चा करते हुए कहा कि सत्व का विकास ही सच्ची समृद्धि का आधार है। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा ज्ञान देती है, जबकि संस्कृति उसका उपयोग जनहित में करना सिखाती है।
चर्चा में प्राचीन भारतीय शिक्षा केंद्रों जैसे
नालंदा, विक्रमशिला और मदुरै के साथ-साथ देश के वैश्विक बौद्धिक प्रभाव को भी रेखांकित किया गया। भारतीय दर्शन पर चर्चा करते हुए
योग, न्याय, मीमांसा और वेदों का उल्लेख किया गया। छात्रों को गहरी पढ़ाई के लिए
महात्मा गांधी की 'हिंद स्वराज',
शशि थरूर की 'इंग्लोरियस एम्पायर' और
धर्मपाल की कृतियों को पढ़ने की सलाह दी गई। कार्यक्रम के अंत में एक
Q&A सत्र भी आयोजित किया गया जिसमें छात्रों के सवालों के जवाब दिए गए।