शहरी भारतीयों में प्रोटीन की जागरूकता तो बढ़ी, लेकिन थाली से अब भी गायब है पोषण: स्टडी

भारत के बड़े शहरों में रहने वाले लोग अब अपनी सेहत और पोषण को लेकर पहले से कहीं ज्यादा जागरूक हो गए हैं, लेकिन यह जागरूकता उनकी डाइट में बदलाव लाने में नाकाम साबित हो रही है। पेप्सिको इंडिया द्वारा यूरोमोनिटर इंटरनेशनल और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मिलेट रिसर्च (IIMR) के साथ मिलकर किए गए एक नए अध्ययन 'द स्टेट ऑफ प्रोटीन एंड फाइबर इन अर्बन इंडिया' में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। इस स्टडी से पता चला है कि लोग पोषण के बारे में बातें तो कर रहे हैं, लेकिन असल में वे अपनी जरूरत के मुताबिक प्रोटीन और फाइबर का सेवन नहीं कर पा रहे हैं।
इस सर्वे में दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता और कोच्चि के 18 से 50 वर्ष की आयु के 1,250 लोगों को शामिल किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, एक बड़ा अंतर जागरूकता और असल समझ के बीच है। जहां 74 प्रतिशत लोगों ने दावा किया कि वे अपनी दैनिक प्रोटीन आवश्यकता के बारे में जानते हैं, वहीं असल में 56 प्रतिशत लोग इस बारे में गलत जानकारी रखते थे या पूरी तरह अनभिज्ञ थे।
प्रोटीन और फाइबर की कमी के पीछे की बड़ी वजहें
स्टडी के आंकड़े बताते हैं कि 70 प्रतिशत लोग रोजाना 41 ग्राम से कम प्रोटीन ले रहे हैं, जो कि अनुशंसित स्तर से काफी नीचे है। यही हाल फाइबर का भी है; 89 प्रतिशत लोग फाइबर की सही मात्रा को पहचानने में असमर्थ रहे और 61 प्रतिशत लोग इसकी जरूरत से कम मात्रा का सेवन कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि फाइबर की यह कमी जेन एक्स (Gen X) पीढ़ी में ज्यादा (65%) देखी गई, जबकि जेन जेड और मिलेनियल्स में यह 58% थी।
जब लोगों से पूछा गया कि वे अपनी डाइट में प्रोटीन क्यों नहीं शामिल कर पा रहे, तो सामने आईं कुछ प्रमुख बाधाएं:
- महंगाई: लगभग 60 प्रतिशत लोगों ने प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों की अधिक कीमत को एक बड़ी रुकावट बताया।
- सुविधा का अभाव: 57 प्रतिशत लोगों का मानना है कि बाजार में सुविधाजनक और भरोसेमंद प्रोटीन विकल्पों की कमी है।
- फाइबर की पहुंच: फाइबर के मामले में स्थिति और भी खराब है, जहां 69 प्रतिशत लोगों ने सही विकल्पों की कमी की शिकायत की।
पेप्सिको इंडिया की आरएंडडी लाइफसाइंस डायरेक्टर डॉ. अंकिता मरवाहा ने इस स्टडी पर जोर देते हुए कहा कि केवल जागरूकता काफी नहीं है, बल्कि जरूरत इस बात की है कि लोग इस जानकारी को अपने रोजमर्रा के खान-पान में कैसे उतारें। उन्होंने कहा कि उपभोक्ताओं की जरूरतों को समझना और उन्हें बेहतर विकल्प देना जरूरी है ताकि वे स्वास्थ्य के प्रति सही फैसले ले सकें।
इस अध्ययन के निष्कर्षों को कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (CII) के एक कार्यक्रम में साझा किया गया, जहां पोषण विशेषज्ञों और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिनिधियों ने इस बात पर चर्चा की कि कैसे स्वस्थ विकल्पों को आम लोगों के लिए अधिक सुलभ और किफायती बनाया जा सकता है।