ग्लोबल इकोनॉमिक रिस्क: पीके मिश्रा बोले- अर्थव्यवस्था के लिए अब भूगोल फिर हुआ अहम

नई दिल्ली में आयोजित पांचवें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव के दौरान प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीके मिश्रा ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की बदलती तस्वीर पर गहरी चिंता और रणनीतिक सुझाव साझा किए। 'ए वर्ल्ड प्राइस्ड फॉर रिस्क' सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में आर्थिक जोखिमों का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। अब हम केवल उन जोखिमों का सामना नहीं कर रहे जिन्हें मापा जा सके, बल्कि ऐसी अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं जिनका अंदाजा लगाना मुश्किल है।
पीके मिश्रा ने इस बात पर जोर दिया कि एक समय था जब माना जाता था कि तकनीक ने भूगोल (Geography) की अहमियत को खत्म कर दिया है, लेकिन अब भूगोल एक बार फिर आर्थिक फैसलों के केंद्र में आ गया है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे शिपिंग रूट में आने वाली बाधाएं हजारों किलोमीटर दूर ऊर्जा की कीमतों को प्रभावित करती हैं। इसके अलावा, महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) का कुछ ही देशों में केंद्रित होना दुनिया के लिए नई कमजोरियां पैदा कर रहा है।
रेजिलिएंस और आत्मनिर्भरता का नया नजरिया
मिश्रा ने कहा कि जब अनिश्चितता बढ़ती है, तो कंपनियों और सरकारों का व्यवहार बदल जाता है। अब कंपनियां केवल सस्ते विकल्प नहीं ढूंढतीं, बल्कि सप्लायर्स का विविधीकरण करती हैं और इन्वेंट्री बढ़ाकर रखती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि 'रेजिलिएंस' (लचीलापन या मजबूती) मुफ्त में नहीं आता, इसके लिए एक कीमत चुकानी पड़ती है, लेकिन यह उस बड़े नुकसान से बचने के लिए जरूरी है जो किसी बड़ी वैश्विक बाधा के कारण हो सकता है।
भारत के संदर्भ में बात करते हुए उन्होंने कहा कि लचीलेपन का मतलब दुनिया से कट जाना नहीं है, बल्कि दुनिया के लिए खुला रहना और साथ ही अपनी कमजोरियों को कम करना है। उन्होंने भारत की रणनीति के कुछ मुख्य बिंदुओं पर प्रकाश डाला:
- ऊर्जा सुरक्षा: ऊर्जा के स्रोतों को सुरक्षित और विविध बनाना।
- रणनीतिक क्षमताएं: इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में घरेलू क्षमता बढ़ाना।
- मैक्रोइकॉनोमिक मजबूती: पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार और एक मजबूत वित्तीय प्रणाली का होना ताकि बाहरी झटकों को झेला जा सके।
अंत में, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'आत्मनिर्भर भारत' के विजन का जिक्र करते हुए कहा कि आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया के लिए दरवाजे बंद करना नहीं, बल्कि खुद को इतना सक्षम और उत्पादक बनाना है कि हम वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बन सकें। उनके अनुसार, सही रास्ता वह है जहां रणनीतिक रूप से जरूरी चीजों के लिए घरेलू क्षमता हो और बाकी के लिए वैश्विक एकीकरण हो।