पुरानी दिल्ली: 210 साल पुरानी इस दुकान में आज भी बसती है मुगल काल की खुशबू
चांदनी चौक की गुलाबसिंह जोरीमल दुकान आज भी सहेज रही है मुगल काल की खुशबू और पारंपरिक इत्र बनाने की कला।

चांदनी चौक की तंग गलियों और दरीबा कलां के शोर-शराबे के बीच एक ऐसी जगह है, जहां कदम रखते ही आप वक्त के पीछे चले जाते हैं। हम बात कर रहे हैं 'गुलाबसिंह जोरीमल' की, जो सिर्फ एक इत्र की दुकान नहीं, बल्कि खुशबुओं का एक जीता-जागता इतिहास है। 1816 में लाला गुलाब सिंह और उनके बेटे लाला जोरीमल द्वारा शुरू की गई यह दुकान पिछले 210 सालों से अपनी पारंपरिक सुगंध से दुनिया को महका रही है।
इस दुकान की विरासत इतनी गहरी है कि कभी यहां के इत्र मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर और मशहूर शायर मिर्जा गालिब जैसे दिग्गजों की पसंद हुआ करते थे। आज यह कारोबार गुंदी परिवार की आठवीं पीढ़ी संभाल रही है। विनम्र गुंदी और उनके परिवार के सदस्य आज भी उसी पुराने 'डेग भपका' तरीके से इत्र तैयार करते हैं, जो सदियों पहले इस्तेमाल होता था।
प्राकृतिक अर्क और आधुनिकता का संगम
इस दुकान की खासियत यह है कि यहां पश्चिमी देशों की तरह सिंथेटिक केमिकल्स का नहीं, बल्कि पूरी तरह प्राकृतिक और ऑर्गेनिक चीजों का इस्तेमाल होता है। परिवार के सातवीं पीढ़ी के सदस्य मुकुल गुंदी बताते हैं कि वे कच्चा माल कन्नौज से मंगवाते हैं, जिसे भारत की 'इत्र राजधानी' कहा जाता है।
यहां आपको केवल इत्र ही नहीं, बल्कि कई तरह के उत्पाद मिलते हैं, जैसे:
- बिना अल्कोहल वाले अत्तर ऑयल
- शुद्ध डिस्टिलेट्स (Ruh)
- अगरबत्ती, धूप और बखूर
- रूम फ्रेशनर्स
बदलते समय के साथ यह दुकान खुद को ढाल रही है। नई पीढ़ी की पसंद को देखते हुए अब लग्जरी सेंट्स तैयार किए जा रहे हैं, लेकिन इसकी जड़ें आज भी उसी जुनून और पारंपरिक हुनर में हैं। हालांकि, दिल्ली के बदलते पर्यावरण और सर्दियों के स्मॉग जैसी चुनौतियों के बीच इस कला को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती है। इसी विरासत को बढ़ावा देने के लिए दिल्ली टूरिज्म (DTTDC) और कन्नौज के फ्रैग्रेंस एंड फ्लेवर डेवलपमेंट सेंटर द्वारा 'इत्र और सुगंध मेला' लगाने की योजना भी बनाई गई है, ताकि दुनिया इस अनमोल भारतीय विरासत को करीब से देख सके।