नोएडा और ग्रेटर नोएडा के स्कूलों में स्क्रीन टाइम पर लगा लगाम, प्रशासन ने तय की समय सीमा

Kittu Kumari5 October 20262 min read0 viewsNCR
नोएडा और ग्रेटर नोएडा के स्कूलों में स्क्रीन टाइम पर लगा लगाम, प्रशासन ने तय की समय सीमा

बच्चों की आंखों की सेहत और उनके समग्र विकास को ध्यान में रखते हुए गौतम बुद्ध नगर प्रशासन ने एक बड़ा कदम उठाया है। अब नोएडा और ग्रेटर नोएडा के सभी सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों में छात्रों के लिए नोएडा स्कूलों में स्क्रीन टाइम लिमिट सख्ती से लागू की जाएगी। अगस्त 2026 के मध्य में जारी निर्देशों के बाद स्कूलों ने डिजिटल बोर्ड के इस्तेमाल के लिए समय सीमा तय कर दी है।

नए नियमों के मुताबिक, कक्षा 1 से 5 तक के छात्रों के लिए स्क्रीन का उपयोग अधिकतम 30 मिनट और कक्षा 6 से 8 तक के छात्रों के लिए इसे 60 मिनट तक सीमित रखा गया है। प्रशासन का स्पष्ट मानना है कि स्मार्ट बोर्ड का उपयोग केवल कठिन अवधारणाओं को समझाने के लिए एक सहायक उपकरण के रूप में होना चाहिए, न कि पारंपरिक पाठ्यपुस्तकों या ब्लैकबोर्ड की जगह लेना चाहिए।

स्वास्थ्य सुरक्षा और नए नियम

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प्रशासन ने स्कूलों को निर्देश दिया है कि हर 20 मिनट के स्क्रीन उपयोग के बाद छात्रों को ब्रेक दिया जाए। साथ ही, शारीरिक गतिविधियों, पढ़ने और लिखने की आदतों को बढ़ावा देने के लिए पारंपरिक ब्लैक, व्हाइट या ग्रीन बोर्ड के उपयोग को प्राथमिकता दी जाएगी। ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान NCERT के '20-20-20' नियम का पालन करना अनिवार्य होगा, जिसमें हर 20 मिनट बाद 20 फीट दूर किसी वस्तु को 20 सेकंड तक देखना होता है।

जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम ने जोर दिया कि डिजिटल उपकरण केवल पूरक सहायता होने चाहिए, जिससे बच्चे के स्वास्थ्य या खेलकूद में कोई बाधा न आए। इसके अलावा, स्कूलों को हर तिमाही में छात्रों की आंखों की जांच करानी होगी और धुंधला दिखना या सिरदर्द जैसे लक्षण मिलने पर तुरंत अभिभावकों को सूचित करना होगा।

इस फैसले पर शिक्षा जगत की मिली-जुली प्रतिक्रिया रही है। सीबीएसई सिटी कोऑर्डिनेटर नेहा शर्मा और मानव रचना इंटरनेशनल स्कूल की डायरेक्टर प्रिंसिपल निंदिया साकेत ने इस संतुलित दृष्टिकोण का समर्थन किया है। सिल्वरलाइन प्रेस्टीज स्कूल के सीएस नायर ने सीखने की प्रक्रिया में मानवीय संवाद के महत्व को रेखांकित किया। हालांकि, ऑल नोएडा स्कूल पेरेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष यतेंद्र कसाना ने इस फैसले का विरोध किया है। उनका तर्क है कि स्मार्ट क्लासरूम का अनुभव मोबाइल स्क्रीन से अलग होता है और इस फैसले से पहले अभिभावकों और स्कूलों से सलाह ली जानी चाहिए थी।

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