आधुनिक प्रशासन में फिर लौटें चाणक्य के सिद्धांत, नीति आयोग सदस्य ने जताई जरूरत
नीति आयोग सदस्य डॉ. आर. बालसुब्रमण्यम ने आधुनिक शासन में चाणक्य के सिद्धांतों और लोक कल्याण को जोड़ने की वकालत की है।

बेंगलुरु स्थित चाणक्य यूनिवर्सिटी में आयोजित 'भारतीय अर्थशास्त्र परंपरा' पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान नीति आयोग के सदस्य डॉ. आर. बालसुब्रमण्यम ने एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के दौर के प्रशासन को चलाने के लिए प्राचीन भारतीय ज्ञान और चाणक्य के शासन सिद्धांतों को फिर से अपनाने की सख्त जरूरत है। डॉ. बालसुब्रमण्यम के अनुसार, शासन का असली मकसद हमेशा से जनता का कल्याण और समाज की बेहतरी रहा है, और इसे हासिल करने के लिए पुराने सिद्धांतों की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।
सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने चाणक्य का जिक्र किया और बताया कि एक प्रभावी शासक वही होता है जो अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखना जानता हो। उन्होंने चिंता जताई कि एक समय था जब यह ज्ञान आम नागरिकों के बीच गहराई से बसा हुआ था, लेकिन धीरे-धीरे यह सार्वजनिक चेतना से ओझल हो गया। अब समय आ गया है कि शासन व्यवस्था में इस ज्ञान को दोबारा जीवित किया जाए ताकि प्रशासन अधिक पारदर्शी और जनहितैषी बन सके।
प्राचीन ज्ञान और आधुनिक प्रशासन का संगम
डॉ. बालसुब्रमण्यम ने वर्तमान समय में 'षड्गुण्य' और 'सप्तप्रकृति' जैसी पारंपरिक अवधारणाओं की उपयोगिता पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि कैसे ये प्राचीन सूत्र आज की जटिल प्रशासनिक चुनौतियों को सुलझाने में मददगार साबित हो सकते हैं।
यह तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 29 से 31 अक्टूबर 2026 तक चला, जिसका आयोजन चाणक्य यूनिवर्सिटी और उसके 'सेंटर फॉर इंडियन नॉलेज सिस्टम्स' (CIKS) द्वारा किया गया था। यूनिवर्सिटी के संस्थापक कुलपति प्रोफेसर एम. के. श्रीधर ने इस मौके पर कहा कि CIKS की स्थापना ही इसलिए की गई थी ताकि विश्वविद्यालय की सभी गतिविधियों में भारतीय दृष्टिकोण का समावेश हो सके।
इस कार्यक्रम के दौरान 'चाणक्य सुपरसाइट' का शुभारंभ भी किया गया। सम्मेलन में डॉ. विनयचंद्र बनावथी, डॉ. नवीन भट्ट, डॉ. कोएनराड एल्स्ट और गौरवंग दास प्रभु जैसे दिग्गजों ने अपने विचार साझा किए, जबकि सेंटर फॉर इंडियन नॉलेज सिस्टम्स के निदेशक डॉ. रामकृष्ण पेजथया ने धन्यवाद प्रस्ताव के साथ कार्यक्रम का समापन किया।