नेहा बोरा को मिले पुलिस दस्तावेज, मजिस्ट्रेट ने जवाब देने के लिए दिया समय
दिल्ली पुलिस ने नेहा बोरा को जरूरी दस्तावेज सौंपे हैं। कोर्ट ने उन्हें जवाब देने के लिए समय दिया है, अगली सुनवाई 28 अक्टूबर को होगी।

दिल्ली पुलिस ने एआईएसए (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा को वे सभी दस्तावेज और सामग्री सौंप दी है, जिनकी मांग उन्होंने अपनी कानूनी लड़ाई के लिए की थी। मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन के स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) ने शनिवार को पुलिस को यह निर्देश दिए थे, ताकि नेहा बोरा यह समझ सकें कि पुलिस ने उनके खिलाफ क्या सबूत जुटाए हैं और वे इसका उचित जवाब दे सकें।
शनिवार को सुनवाई के दौरान नेहा बोरा की ओर से वकील अभिक चिमनी और प्रांजल अब्रोल पेश हुए। उन्होंने दलील दी कि पुलिस के पास मौजूद सामग्री के बिना यह जानना मुश्किल है कि उन पर क्या आरोप लगाए गए हैं। इसके बाद मजिस्ट्रेट रितु राज (ACP) ने दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए पुलिस को सारा मटेरियल नेहा बोरा को देने का आदेश दिया। अब इन दस्तावेजों की जांच करने के बाद नेहा बोरा कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) से जुड़े मुद्दों पर अपना जवाब दाखिल करेंगी। इस मामले की अगली सुनवाई 28 अक्टूबर को तय की गई है।
क्या है पूरा मामला और पुलिस के आरोप?
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब 16 अक्टूबर को नेहा बोरा ने इंस्टाग्राम पर लोगों को शाम 5 बजे मंडी हाउस में इकट्ठा होने का न्योता दिया था। पुलिस का आरोप है कि उन्होंने निषेधाज्ञा के बावजूद विरोध प्रदर्शन की गतिविधियों में हिस्सा लिया और लोगों को भीड़ जुटाने के लिए उकसाया। पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक, नेहा बोरा कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में एक अनधिकृत प्रदर्शन के लिए लोगों को जुटाने की कोशिश कर रही थीं, जिससे सार्वजनिक शांति भंग होने का खतरा था।
इसी आधार पर पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया था और बाद में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 130 के तहत नोटिस जारी किया गया। पुलिस ने उनसे 10,000 रुपये का पर्सनल बॉन्ड भरने को कहा है ताकि शांति व्यवस्था बनी रहे। हालांकि, नेहा बोरा ने सार्वजनिक रूप से शांति बॉन्ड (Peace Bond) दाखिल करने से इनकार कर दिया है।
इससे पहले 23 अक्टूबर को दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा जारी नोटिस कानूनी रूप से सही है और इसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सुरक्षा उपायों का उल्लंघन नहीं किया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट ने पुलिस रिपोर्ट और सबूतों को देखने के बाद ही यह कदम उठाया है।