नेहा बोरा की याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला, BNSS नोटिस को दी थी चुनौती

AISA नेता नेहा बोरा ने BNSS के तहत जारी नोटिस को चुनौती दी है। दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद अपना आदेश सुरक्षित रखा है।

Kittu Kumari22 October 20262 min read0 viewsDelhi Local
नेहा बोरा की याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला, BNSS नोटिस को दी थी चुनौती

दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को AISA नेता नेहा बोरा दिल्ली हाई कोर्ट में दायर एक याचिका पर सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। नेहा बोरा ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 130 के तहत जारी एक नोटिस को चुनौती दी थी, जो शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने की कार्यवाही से जुड़ा था। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की बेंच ने इस मामले में दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनीं।

सुनवाई के दौरान नेहा बोरा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने पेशी की, जबकि राज्य सरकार का पक्ष अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा और स्टैंडिंग काउंसिल आशीष दीक्षित ने रखा। मुख्य विवाद इस बात पर था कि क्या स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) ने नोटिस जारी करने से पहले उपलब्ध तथ्यों और सबूतों पर सही तरीके से विचार किया था या नहीं।

प्रक्रियात्मक खामियों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बहस

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अधिवक्ता शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि नेहा बोरा केवल सुधारों की मांग कर रही थीं। उन्होंने कहा कि जब जंतर मंतर को विरोध प्रदर्शन स्थल के रूप में हटा दिया गया, तो उन्होंने मंडी हाउस में एक सभा बुलाने का आह्वान किया था। उनके अनुसार, 16 अक्टूबर को सोशल मीडिया पर किया गया पोस्ट केवल एक बैठक की सूचना थी, जिसमें हिंसा भड़काने या किसी गैरकानूनी गतिविधि की कोई बात नहीं थी।

याचिकाकर्ता के वकील ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि नेहा बोरा को 16 अक्टूबर की शाम मंडी हाउस पहुंचने के महज 10-15 मिनट के भीतर हिरासत में ले लिया गया। उन्हें आर.के. पुरम पुलिस स्टेशन ले जाया गया और अगली सुबह तक उनके ठिकाने के बारे में किसी को जानकारी नहीं थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि नोटिस में दिए गए तथ्य गलत हैं, जैसे बिना अनुमति राष्ट्रीय ध्वज फहराने का जिक्र, और यह दस्तावेज़ केवल 'कट-एंड-पेस्ट' तरीके से तैयार किया गया है।

अदालत ने इस दौरान व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व पर जोर दिया। जस्टिस प्रसाद ने टिप्पणी की कि जब किसी नागरिक की आजादी दांव पर होती है, तो कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया ही उसका एकमात्र सुरक्षा कवच होती है। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि क्या मजिस्ट्रेट ने सूचना की विश्वसनीयता की स्वतंत्र रूप से जांच की थी या पहले से ही कोई राय बना ली थी।

राज्य सरकार ने अपनी दलील में कहा कि यह कार्यवाही निवारक (preventive) प्रकृति की थी और इसे शांति भंग होने की आशंका के आधार पर किया गया था। अब कोर्ट ने सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद अपना अंतिम आदेश सुरक्षित रख लिया है।

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