दिल्ली में जनजातीय संवैधानिक अधिकारों और कानूनी सुरक्षा पर नेशनल कॉन्क्लेव शुरू

देश के जनजातीय समुदायों को उनके संवैधानिक अधिकार दिलाने और कानूनी सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से दिल्ली के स्कोप कॉम्प्लेक्स में दो दिवसीय नेशनल कॉन्क्लेव का आगाज हुआ है। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओराम ने मंगलवार को इस महत्वपूर्ण सम्मेलन का उद्घाटन किया। इस कॉन्क्लेव में देशभर के वरिष्ठ अधिकारी और विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे हैं, ताकि यह समझा जा सके कि जनजातीय समाज को अपने अधिकारों तक पहुँचने में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
6 और 7 अक्टूबर तक चलने वाले इस आयोजन में विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के जनजातीय कल्याण और राजस्व विभागों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए हैं। सम्मेलन का मुख्य मकसद कार्यान्वयन में आने वाली बाधाओं को पहचानना और उन्हें दूर करने के लिए जरूरी सुझाव देना है। उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए जुएल ओराम ने जोर दिया कि अलग-अलग राज्यों के अनुभवों और बेहतरीन तौर-तरीकों को साझा किया जाए, जिससे एक-दूसरे से सीखकर जनजातीय अधिकारों की सुरक्षा को बेहतर बनाया जा सके।
डिजिटलीकरण और पारदर्शिता पर जोर
मंत्री जुएल ओराम ने कहा कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों के इनपुट बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि वास्तव में समस्या कहाँ आ रही है। इससे केंद्र सरकार को व्यावहारिक समाधान और गाइडलाइंस तैयार करने में मदद मिलेगी। वहीं, जनजातीय कार्य राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए संदेश दिया कि पूरी प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और समयबद्ध होनी चाहिए, ताकि फर्जी दावों पर रोक लगाई जा सके और असली हकदारों को लाभ मिले।
जनजातीय कार्य सचिव रंजना चोपड़ा ने बताया कि इस कॉन्क्लेव के जरिए उन साझा चुनौतियों की पहचान की जाएगी जो पूरे देश में एक जैसी हैं। उन्होंने अधिकारों की पहुँच सुधारने के लिए रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण, ऑनलाइन ट्रैकिंग सिस्टम, बेहतर शिकायत निवारण तंत्र और राज्यों के बीच मजबूत सत्यापन प्रक्रिया की आवश्यकता पर बल दिया।
इस कार्यक्रम में लगभग 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 75 से अधिक प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। दो दिनों तक चलने वाले इस कार्यक्रम में तकनीकी सत्र और खुली चर्चाएं होंगी, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि जनजातीय समुदायों के लिए उपलब्ध संवैधानिक सुरक्षा कवच केवल कागजों तक सीमित न रहकर वास्तव में प्रभावी और सुलभ बनें।