दिल्ली की यमुना नदी की मछलियों में मिले माइक्रोप्लास्टिक्स, इंसानों के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा

दिल्ली यूनिवर्सिटी की एक नई स्टडी में सामने आया है कि यमुना नदी से पकड़ी गई सभी फ्रेशवॉटर मछली प्रजातियों में माइक्रोप्लास्टिक्स पाए गए हैं। 3 अगस्त 2026 को पब्लिश हुई इस स्टडी के अनुसार, हरियाणा के upstream हिस्से के मुकाबले दिल्ली के हिस्से की मछलियों में प्रदूषण का स्तर काफी ज्यादा मिला है। यह जानकारी PTI News की रिपोर्ट में सामने आई है। प्लास्टिक के ये कण केवल पाचन तंत्र में ही नहीं, बल्कि मसल टिश्यूज में भी पाए गए हैं, जिससे इंसानों के लिए सीधा खतरा पैदा हो गया है।
मछलियों के शरीर के विभिन्न हिस्सों में मिले प्लास्टिक के कण
स्टडी में बताया गया है कि सैंपलिंग में ली गई मछलियों के गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट में 751 पार्टिकल्स, गिल्स में 605 पार्टिकल्स और मसल टिश्यूज में 322 पार्टिकल्स माइक्रोप्लास्टिक्स के मिले हैं। शोधकर्ताओं ने दिल्ली की यमुना को हाई माइक्रोप्लास्टिक कंटामिनेशन जोन बताया है। सोनिया विहार की सर्वभक्षी ओरियोक्रोमिस नाइलोटिकस (तिलापिया) सबसे ज्यादा प्रदूषित प्रजाति पाई गई, जिसमें 436 माइक्रोप्लास्टिक पार्टिकल्स मिले और इसे 'Category IV' हाई इकोलॉजिकल खतरा माना गया है।
FSSAI और अदालतों के कदम
खाने में प्रदूषण को लेकर FSSAI ने मार्च 2024 में 'माइक्रो-एंड नैनो-प्लास्टिक्स एज इमर्जिंग फूड कंटामिनेंट्स' प्रोजेक्ट शुरू किया था। यह प्रोजेक्ट CSIR-IITR के साथ मिलकर भारत में इसके स्तर का आकलन कर रहा है। इसके अलावा, 14 फरवरी 2026 को मद्रास हाईकोर्ट ने FSSAI और स्वास्थ्य मंत्रालय को पैक्ड ड्रिंकिंग वॉटर, नमक और चीनी पर चेतावनी लेबल लगाने का निर्देश दिया है। मार्च 2025 में FSSAI ने कड़े सुरक्षा मानकों के तहत रीसायकल प्लास्टिक की अनुमति दी थी।
व्यापक स्टडी और प्रदूषण नियंत्रण की जरूरत
दिल्ली सरकार द्वारा शुरू की गई और TERI द्वारा 2024-25 के दौरान की गई सालभर की स्टडी ने भी यमुना, नालों, बाढ़ के मैदान की मिट्टी और ग्राउंडवाटर में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण की पुष्टि की है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रदूषण से निपटने के लिए सीवेज मैनेजमेंट, इंडस्ट्रियल वेस्ट नियमों, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट और प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करने की जरूरत है।