सुप्रीम कोर्ट में गृह सचिव की माफी पर MHA का जवाब, कहा- यह महज एक कानूनी प्रक्रिया

केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने सुप्रीम कोर्ट में गृह सचिव द्वारा मांगी गई बिना शर्त माफी को लेकर एक बड़ा स्पष्टीकरण जारी किया है। मंत्रालय ने साफ किया है कि गृह सचिव की यह माफी किसी गलती की स्वीकारोक्ति नहीं, बल्कि अवमानना याचिकाओं (Contempt Petitions) में अपनाई जाने वाली एक अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया है। यह कदम उन मीडिया रिपोर्ट्स के बाद उठाया गया जिनमें दावा किया गया था कि गृह सचिव ने अदालत के नोटिस के बाद माफी मांगी है।
गृह मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जानकारी देते हुए बताया कि जब भी माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवमानना का नोटिस जारी किया जाता है, तो जवाब देने वाले पक्ष के लिए अपने हलफनामे की शुरुआत बिना शर्त माफी से करना अनिवार्य होता है। इसके बाद ही तथ्यों और दलीलों को पेश किया जाता है। मंत्रालय के अनुसार, गृह सचिव, पुलिस कमिश्नर और अन्य संबंधित अधिकारियों ने इसी परंपरा का पालन करते हुए अपने हलफनामों का पहला पैराग्राफ लिखा था।
कानून का पालन और इंटरनेट निलंबन का तर्क
MHA ने अपने बयान में जोर देकर कहा कि सरकार और पुलिस द्वारा की गई सभी कार्रवाइयां पूरी तरह से कानून के दायरे में थीं और इसमें अवमानना का कोई मामला नहीं बनता है। गृह सचिव गोविंद मोहन ने अदालत को बताया कि 9 अक्टूबर को दिल्ली में लगाए गए प्रतिबंधों का उद्देश्य शांति बनाए रखना और सार्वजनिक व्यवस्था में किसी भी तरह की गड़बड़ी को रोकना था। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह निर्णय बिना अनुमति के होने वाले विरोध प्रदर्शनों और जुलाई में NEET प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली पुलिस के अनुभवों को देखते हुए लिया गया था।
इंटरनेट सेवाओं के निलंबन पर स्पष्टीकरण देते हुए उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस ने केवल एक दिन के लिए सेलुलर इंटरनेट बंद करने का अनुरोध किया था, जिसे कानून के अनुसार उचित माना गया। यह निलंबन 9 अक्टूबर रात 10 बजे से 10 अक्टूबर रात 10 बजे तक केवल राष्ट्रपति भवन (रायसीना हिल) के 4 किलोमीटर के दायरे में था। खास बात यह रही कि इसमें केवल मोबाइल इंटरनेट बंद था, जबकि वाई-फाई और ब्रॉडबैंड सेवाएं चालू थीं। गृह सचिव ने अब अदालत से अवमानना नोटिस को वापस लेने और ऐसी स्थितियों में इंटरनेट निलंबन की अनुमति देने के लिए आदेश में संशोधन की प्रार्थना की है।