मिच्छामी दुक्कड़म: सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि क्षमा और आत्म-शुद्धि की गहरी भावना है

Kittu Kumari3 October 20262 min read0 viewsDelhi Local
मिच्छामी दुक्कड़म: सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि क्षमा और आत्म-शुद्धि की गहरी भावना है

बचपन की यादें अक्सर हमारे साथ चलती हैं, लेकिन कुछ बातें समय के साथ और अधिक स्पष्ट होने लगती हैं। दिल्ली के मॉडर्न स्कूल, वसंत विहार में पढ़ते समय लेखक का परिचय जैन परंपरा से उनके सहपाठी मोहित जैन के जरिए हुआ। उस समय 'मिच्छामी दुक्कड़म' शब्द केवल एक ध्वनि जैसा था, लेकिन आज यह शब्द जीवन के एक बड़े दर्शन और नैतिकता को समेटे हुए नजर आता है।

हाल ही में अमूल डेयरी के प्रमुख जयेन मेहता के एक संदेश ने इस परंपरा की गहराई को फिर से जीवंत कर दिया। उन्होंने पर्युषण और संवत्सरी के महत्व को साझा करते हुए बताया कि कैसे यह समय आत्म-शुद्धि का होता है। मेहता साहब ने लगभग 36 घंटे का कठिन उपवास रखा, जिसमें भोजन और पानी दोनों का त्याग था। यह उपवास केवल शारीरिक अनुशासन नहीं, बल्कि अपनी गलतियों को स्वीकार करने और विनम्रता सीखने का एक जरिया था।

पर्युषण और संवत्सरी: आत्म-निरीक्षण का समय

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जैन धर्म में पर्युषण का पर्व बहुत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। श्वेतंबर समुदाय इसे आठ दिनों तक मनाता है, जबकि दिगंबर परंपरा में इसे 'दस लक्षण' पर्व के रूप में दस दिनों तक मनाया जाता है। यह समय मानसून के दौरान आता है, जब जैन मुनि एक स्थान पर ठहरते हैं और गृहस्थ लोग अध्ययन, संयम और उपवास के जरिए अपनी आत्मा को निखारते हैं।

संवत्सरी इस पूरी प्रक्रिया का चरम बिंदु होता है। इस दिन 'प्रतिक्रमण' की रस्म निभाई जाती है, जिसका अर्थ है अपने आचरण की समीक्षा करना। यह केवल अपनों से माफी मांगना नहीं है, बल्कि दुनिया के हर जीवित प्राणी के प्रति क्षमा भाव रखना है। 'मिच्छामी दुक्कड़म' का सरल अर्थ है कि मेरे द्वारा किए गए सभी बुरे कार्य निष्फल हो जाएं और मुझे क्षमा कर दिया जाए।

इस परंपरा की गहराई इस प्रार्थना में छिपी है: "मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ; सभी जीव मुझे क्षमा करें; मैं सबका मित्र बनूँ और किसी से मेरा कोई वैर न रहे।" यह विचार केवल शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि जैन धर्म के 'अहिंसा' के सिद्धांत पर आधारित है, जो मन, वचन और कर्म से किसी को भी चोट न पहुँचाने की सीख देता है।

लेखक की माँ, सुनीता सरन ने इस भावना को और भी सरल शब्दों में समझाया। उन्होंने बताया कि हम सभी इंसान हैं और गलतियाँ करना स्वाभाविक है। कभी-कभी हम बिना किसी बुरी मंशा के भी अपनी बातों या व्यवहार से दूसरों को दुखी कर देते हैं। ऐसे में, यह परंपरा हमें अपनी कमियों को देखने और उन्हें सुधारने का अवसर देती है, न कि उन्हें सही ठहराने का।

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