शहर के बीच बसा एक गांव: कोटला मुबारकपुर की गलियों में छिपी उम्मीद और संघर्ष की कहानी

दिल्ली का कोटला मुबारकपुर इलाका एक ऐसी जगह है जहां शहर की चकाचौंध और गांव की सादगी एक साथ नजर आते हैं। साउथ एक्सटेंशन, डिफेंस कॉलोनी और एम्स जैसे बड़े संस्थानों के करीब होने के बावजूद, यह इलाका अपनी एक अलग और अलग पहचान रखता है। बाहरी दुनिया के लिए यह शायद सिर्फ संकरी गलियों और टूटी सड़कों वाला एक इलाका हो, लेकिन इसके भीतर भाषाओं, रिवाजों और अलग-अलग तरह के जीवन जीने के तरीकों का एक खूबसूरत संगम है।
अक्सर बाहरी लोग इस इलाके को लेकर कुछ गलत धारणाएं बना लेते हैं। डेटिंग ऐप्स से लेकर आम बातचीत तक, कई बार कोटला मुबारकपुर को 'खतरनाक' या 'असुरक्षित' बता दिया जाता है। लोगों का कहना है कि यहां के युवा अक्सर गलत संगत में पड़ जाते हैं, जिससे इलाके की छवि प्रभावित होती है। लेकिन क्या यह पूरा सच है? या फिर यह सिर्फ एक अफवाह है जिसने इस इलाके और बाहरी दुनिया के बीच एक दीवार खड़ी कर दी है?
तोशी सिद्दीकी: रूढ़ियों को तोड़ता एक युवा चेहरा
इस इलाके की असलियत को समझने के लिए 17 साल के तोशी सिद्दीकी की कहानी काफी कुछ बयां करती है। जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी में बी.कॉम के प्रथम वर्ष के छात्र तोशी उन युवाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो अपनी जड़ों से जुड़े रहकर बदलाव लाना चाहते हैं। तोशी ने अपनी मेहनत से अच्छी रैंक हासिल की, हालांकि वह एसआरसीसी जैसे बड़े कॉलेज में नहीं जा पाए, लेकिन उनके अंदर सीखने और आगे बढ़ने का जज्बा कम नहीं है।
तोशी अपनी बस्ती की कमियों को बखूबी जानते हैं। वह कहते हैं कि यहां की सड़कें टूटी हुई हैं और गंदगी एक बड़ी समस्या है। लेकिन वह सिर्फ शिकायत नहीं करते, बल्कि समाधान की बात करते हैं। उनका मानना है कि शिक्षा के जरिए लोगों की सोच बदली जा सकती है—चाहे वह कचरा फेंकने का सही तरीका हो या महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहार।
तोशी के जीवन में अनुशासन और जिम्मेदारी उनके माता-पिता की देन है। उनके पिता, जो शामली के कांडला से महज 13 साल की उम्र में दिल्ली आए थे, आज एल्युमीनियम और ग्लास का सफल बिजनेस चलाते हैं। उनकी मां परिवार को एकजुट रखने वाली एक मजबूत कड़ी हैं। तोशी के माता-पिता ने उन पर डॉक्टर या इंजीनियर बनने का दबाव नहीं डाला, बल्कि उन्हें अपनी पसंद का रास्ता चुनने की आजादी दी।
आज तोशी का सपना सिर्फ पैसा कमाना नहीं है, बल्कि इतना समृद्ध होना है कि वह एम्स के बाहर फुटपाथों पर सोने वाले बीमार और बेसहारा लोगों की मदद कर सकें। उनकी यह सोच बताती है कि कोटला मुबारकपुर जैसे इलाकों में केवल 'गलत संगत' नहीं, बल्कि करुणा और जिम्मेदारी की गहरी भावना रखने वाले युवा भी पल रहे हैं।