कालिंदी कॉलेज POSH पैनल की चुनौती खारिज, दिल्ली हाई कोर्ट ने 90 दिनों में जांच पूरी करने का दिया आदेश
दिल्ली हाई कोर्ट ने कालिंदी कॉलेज के नए POSH पैनल को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की और 90 दिनों में जांच पूरी करने का आदेश दिया।

दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के कालिंदी कॉलेज की दो एसोसिएट प्रोफेसरों द्वारा दायर एक याचिका को खारिज कर दिया है। इन प्रोफेसरों ने यौन उत्पीड़न की शिकायत की जांच के लिए गठित एक नई आंतरिक समिति (Internal Committee) के गठन को चुनौती दी थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा पक्षपात की जो आशंकाएं जताई गई थीं, उनके समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यौन उत्पीड़न की शिकायतों से संबंधित वैधानिक ढांचे में यह प्रावधान नहीं है कि कुलपति (VC) किसी कॉलेज के भीतर की शिकायत की जांच के लिए यूनिवर्सिटी स्तर की अलग समिति बनाएं। ऐसी जांच केवल कानून के तहत गठित आंतरिक समिति द्वारा ही की जानी चाहिए। हालांकि, अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि यह शिकायत 15 महीनों से अधिक समय से लंबित है, इसलिए नई समिति को निर्देश दिया गया है कि वह फैसले की कॉपी मिलने के 90 दिनों के भीतर जांच पूरी करे।
क्या है पूरा मामला और विवाद की जड़?
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब जूलॉजी और पॉलिटिकल साइंस विभाग की दो प्रोफेसरों ने 7 जुलाई 2025 को कॉलेज प्रिंसिपल को एक संयुक्त शिकायत सौंपी। उन्होंने कॉलेज के चार फैकल्टी सदस्यों पर उत्पीड़न, डराने-धमकाने और यौन रंगत वाली अभद्र टिप्पणियां करने का आरोप लगाया था। यह आरोप स्टाफ एसोसिएशन के व्हाट्सएप ग्रुप और 3 जुलाई 2025 को हुई एक बैठक में की गई बातचीत से जुड़े थे।
शुरुआती जांच करने वाली समिति ने 19 सितंबर 2025 को अपनी रिपोर्ट दी थी, जिसमें कहा गया था कि आरोप "यौन प्रकृति के नहीं हैं"। इस रिपोर्ट को कॉलेज की गवर्निंग बॉडी ने स्वीकार कर लिया था। लेकिन शिकायतकर्ताओं ने इस नतीजे को चुनौती दी और एक निष्पक्ष समिति से जांच की मांग की, क्योंकि उनका दावा था कि पिछली समिति का एक सदस्य उन घटनाओं से जुड़ा था जिनकी शिकायत की गई थी।
मामला जब हाई कोर्ट पहुंचा, तो कुलपति को स्वतंत्र निर्णय लेने का निर्देश दिया गया। जुलाई 2016 में कुलपति ने पाया कि समिति के एक सदस्य की संलिप्तता से पक्षपात की उचित आशंका पैदा होती है और यूजीसी के 2015 नियमों के तहत बाहरी सदस्य की अनिवार्यता का पालन नहीं किया गया था। इसके बाद कुलपति ने पिछली जांच को रद्द कर नई निष्पक्ष समिति बनाने का आदेश दिया।
प्रिंसिपल ने 28 जुलाई को एक नई समिति बनाई, जिसमें एक महिला फैकल्टी सदस्य को पीठासीन अधिकारी बनाया गया और दिल्ली यूनिवर्सिटी के लॉ फैकल्टी से एक प्रोफेसर को बाहरी सदस्य के तौर पर शामिल किया गया। पुरानी समिति के किसी भी सदस्य को इसमें जगह नहीं दी गई, इसके बावजूद शिकायतकर्ताओं ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसे अब अदालत ने खारिज कर दिया है।