"मैं वहां कश्मीरी हिंदू नहीं, संवैधानिक जज था": आर्टिकल 370 के फैसले पर बोले जस्टिस संजय किशन कौल
पूर्व जस्टिस संजय किशन कौल ने बताया कि कैसे उन्होंने आर्टिकल 370 के फैसले के दौरान अपनी व्यक्तिगत पहचान से ऊपर उठकर संवैधानिक जज की भूमिका निभाई।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय किशन कौल ने न्यायिक निष्पक्षता और व्यक्तिगत विरासत के बीच के बारीक संतुलन पर अपने विचार साझा किए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब वे आर्टिकल 370 के ऐतिहासिक फैसले पर सुनवाई कर रहे थे, तब उन्होंने अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि को किनारे रखकर केवल एक संवैधानिक न्यायाधीश के रूप में काम किया।
दिसंबर 2023 में पांच जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से आर्टिकल 370 को हटाने के फैसले को बरकरार रखा था। इस प्रक्रिया पर बात करते हुए जस्टिस कौल ने कहा कि न्याय देने के लिए न्यायाधीशों को अपने व्यक्तिगत इतिहास से ऊपर उठना पड़ता है। उन्होंने बताया, "मैं वहां एक जज था, कश्मीरी हिंदू नहीं। इसी वजह से मैं उस जिम्मेदारी को निभा सका।"
जस्टिस कौल ने अपने परिवार के दर्द को याद करते हुए कहा कि उनके पूर्वजों ने 1947 के विभाजन और कश्मीर समस्या का गहरा दुख झेला है। उन्होंने जोर दिया कि जिस तरह विभाजन के बाद लोगों को जीवन में आगे बढ़ना पड़ा, उसी तरह अब कश्मीर के मामले में भी आगे बढ़ने की जरूरत है।
मानवाधिकारों और 'ट्रुथ एंड रिकॉन्सिलिएशन कमीशन' पर जोर
जस्टिस कौल ने अपने फैसले में एक 'सत्य और सुलह आयोग' (Truth and Reconciliation Commission) की सिफारिश की थी। उनका मानना है कि 1980 के दशक के अंत से जम्मू-कश्मीर में राज्य और गैर-राज्य अभिनेताओं द्वारा किए गए मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक गलतियों को स्वीकार नहीं किया जाता, तब तक जख्म नहीं भरते।
उन्होंने कहा, "समुदाय इस बात से आहत है कि जो गलत हुआ, उसे स्वीकार नहीं किया गया। कम से कम यह तो माना जाए कि ऐसा हुआ और वह गलत था।" उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उग्रवाद के दौर में सेना और सशस्त्र बलों ने युद्ध लड़ा, और उस दौरान भी कुछ चीजें गलत हुई होंगी, जिन्हें स्वीकार कर ही हीलिंग प्रोसेस (उपचार प्रक्रिया) शुरू हो सकती है।
इसके अलावा, जस्टिस कौल ने राफेल डील से जुड़े फैसलों का बचाव करते हुए कहा कि कोर्ट रक्षा खरीद जैसे तकनीकी मामलों में सरकार की विशेषज्ञता की जगह नहीं ले सकता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनके फैसले कभी सरकार के पक्ष में रहे तो कभी खिलाफ, जो यह दर्शाता है कि न्यायिक निर्णय केवल कानून और तथ्यों पर आधारित होते हैं, न कि किसी राजनीतिक झुकाव पर।
अंत में, जंतर मंतर के प्रदर्शनों से जुड़े सौरव दास के साथ अपनी एक वायरल तस्वीर पर सफाई देते हुए उन्होंने कहा कि वह फोटो एक साल पहले दिवाली के समय की है और उनका उस व्यक्ति या उसकी विचारधारा से कोई राजनीतिक संबंध नहीं है।