JNU में आरक्षित सीटों का विवाद: NCSC और NCST ने प्रशासन से मांगा जवाब
JNU में SC/ST आरक्षित सीटों के गायब होने पर NCSC और NCST ने प्रशासन से जवाब मांगा है। जानें पूरा मामला।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों के गायब होने का मामला अब गरमा गया है। इस गंभीर मुद्दे पर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) ने हस्तक्षेप करते हुए यूनिवर्सिटी प्रशासन को कड़ी चेतावनी दी है। NCSC ने प्रशासन को निर्देश दिया है कि वाइवा-वोसे (Viva-Voce) परीक्षाओं से पहले इन गायब सीटों को फिर से अधिसूचित किया जाए, अन्यथा प्रशासन को इसका ठोस कारण बताना होगा।
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब JNUSU (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ) के पदाधिकारियों ने इस मामले की शिकायत की। आयोग ने मामले की गंभीरता को देखते हुए यूनिवर्सिटी प्रशासन को सोमवार को पूछताछ के लिए तलब किया है। वहीं, NCST ने भी इस मामले में दखल देते हुए इक्वल अपॉर्चुनिटी सेल (EOC) को तुरंत जांच करने के निर्देश दिए हैं। आयोग ने यह भी साफ कर दिया है कि ST सीटों के आरक्षण से जुड़ी गड़बड़ियों के लिए कुलपति (Vice-Chancellor) की जवाबदेही तय की जाएगी।
छात्र संघ ने कहा- आरक्षण संवैधानिक अधिकार है, प्रशासनिक उपकार नहीं
इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए JNUSU की अध्यक्ष अदिति ने कहा कि NCSC और NCST का हस्तक्षेप जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। उन्होंने जोर दिया कि प्रशासन को तुरंत इन आरक्षित सीटों के मुद्दे को हल करना चाहिए ताकि SC और ST छात्रों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हो सके।
छात्र संघ की उपाध्यक्ष गोपिका ने प्रशासन पर निशाना साधते हुए कहा, "आरक्षण कोई प्रशासनिक उपकार नहीं, बल्कि एक संवैधानिक अधिकार है। यूनिवर्सिटी इन गायब सीटों पर चुप्पी नहीं साध सकती। हमें पारदर्शिता और तुरंत सुधारात्मक कार्रवाई चाहिए।"
वहीं, महासचिव सुनील और संयुक्त सचिव दानिश ने भी अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि वैधानिक आयोगों का हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि यह मामला कितना गंभीर है। छात्र संघ की मांग है कि वाइवा-वोसे से पहले सभी आरक्षित सीटों की स्थिति स्पष्ट की जाए ताकि किसी भी योग्य छात्र को उसके हक से वंचित न रहना पड़े। JNUSU ने स्पष्ट किया है कि जब तक सभी आरक्षित सीटों का हिसाब नहीं मिल जाता और नियमों का पूर्ण कार्यान्वयन नहीं होता, वे अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।