जंतर मंतर अब विरोध प्रदर्शन का केंद्र नहीं, दिल्ली पुलिस ने हटाया नाम; क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह कानूनी है?

दिल्ली पुलिस ने एक बड़ा फैसला लेते हुए जंतर मंतर को विरोध प्रदर्शनों के लिए निर्धारित स्थल की सूची से हटा दिया है यानी इसे डी-नोटिफाई कर दिया है। अब प्रदर्शनकारियों के लिए तीन नए स्थान—रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली का सीबीडी ग्राउंड तय किए गए हैं। हालांकि, इस कदम ने एक बड़ी कानूनी बहस छेड़ दी है कि क्या यह फैसला सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2018 में दिए गए उस आदेश के खिलाफ है, जिसमें जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शनों पर पूरी तरह पाबंदी लगाने को गलत ठहराया गया था।
दरअसल, यह पूरा मामला गृह मंत्रालय द्वारा गठित एक समिति की सिफारिशों के बाद सामने आया है। दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार ने स्पष्ट किया है कि इन तीन नए स्थलों पर प्रदर्शनों के आयोजन के लिए एक विस्तृत और संशोधित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) अलग से जारी किया जाएगा। यह बदलाव अप्रैल 2022 के पुराने आदेश में किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की 2018 की अहम टिप्पणी
अगर हम कानूनी पहलू को देखें, तो 2018 में 'मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। उस समय नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने जंतर मंतर रोड पर धरने और प्रदर्शनों को तुरंत रोकने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने उस पाबंदी को पलटते हुए कहा था कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत एक मौलिक अधिकार है।
कोर्ट ने माना था कि जंतर मंतर के निवासियों को प्रदर्शनों से परेशानी होती है, लेकिन इसका समाधान प्रदर्शनों को पूरी तरह खत्म करना नहीं, बल्कि उन्हें रेगुलेट करना है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि "पूर्ण समाप्ति संतुलन बनाना नहीं है। संतुलन का अर्थ है एक वर्ग के अधिकार को कुछ हद तक कम करना ताकि दूसरे वर्ग का अधिकार भी सुरक्षित रहे।"
सुप्रीम कोर्ट ने तब दिल्ली पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया था कि जंतर मंतर के एक सीमित हिस्से को छोटे समूहों के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के लिए खुला रखा जाए, ताकि निवासियों को असुविधा न हो। 2019 में भी कोर्ट ने इसी बात को दोहराया था कि प्रदर्शनों का नियमन जरूरी है, लेकिन उन्हें पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता।
अब सवाल यह उठता है कि क्या जंतर मंतर को पूरी तरह डी-नोटिफाई करना और प्रदर्शनकारियों को शहर के दूसरे कोनों में भेजना 'नियमन' (Regulation) की श्रेणी में आता है या यह मौलिक अधिकार का हनन है? यह कानूनी सवाल अब आने वाले समय में चर्चा का केंद्र बन सकता है।