जामिया यूनिवर्सिटी की दीवारों पर लिखे आपत्तिजनक नारे, स्टाफ ने जताया कड़ा विरोध; कक्षाएं हुईं ऑनलाइन
जामिया मिलिया इस्लामिया में दीवारों पर आपत्तिजनक नारे लिखे जाने के बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन और स्टाफ ने कड़ा रुख अपनाया है।

देश की प्रतिष्ठित जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी इन दिनों विवादों के घेरे में है। कैंपस की दीवारों पर लिखे गए बेहद आपत्तिजनक नारों और तोड़फोड़ की घटनाओं ने यूनिवर्सिटी प्रशासन और शिक्षकों को झकझोर कर रख दिया है। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए यूनिवर्सिटी ने अब ऑनलाइन मोड की ओर रुख किया है। शनिवार को यूनिवर्सिटी के अंसारी ऑडिटोरियम लॉन्स में एक बड़ी बैठक हुई, जिसमें कुलपति प्रोफेसर मज़हर आसिफ, रजिस्ट्रार प्रोफेसर मोहम्मद महताब आलम रिज़वी और करीब 1.500 टीचिंग और नॉन-टीचिंग स्टाफ सदस्य शामिल हुए।
यूनिवर्सिटी के स्टाफ ने कैंपस में हुई इस तरह की हरकतों पर गहरा दुख जताया है। उनका कहना है कि 106 साल पुरानी इस संस्था की गरिमा और शैक्षणिक माहौल को इस तरह से नुकसान पहुँचाना कतई स्वीकार नहीं है। बैठक में यह बात उभरकर आई कि कुछ छात्रों द्वारा देश की अखंडता, सुरक्षा और संप्रभुता के खिलाफ लिखे गए नारे न केवल निंदनीय हैं, बल्कि इससे पूरी यूनिवर्सिटी की छवि खराब हो रही है।
छात्रों के प्रदर्शन और प्रशासन की कोशिशें
दरअसल, यह पूरा विवाद जामिया मिलिया इस्लामिया स्टूडेंट्स यूनियन (JMISU) के चुनावों की मांग को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इस मसले को सुलझाने के लिए 18 अक्टूबर को सात सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति बनाई थी, लेकिन प्रदर्शनकारी छात्र बातचीत के लिए तैयार नहीं हुए।
बैठक में लिए गए मुख्य निर्णय इस प्रकार हैं:
- प्रदर्शनकारियों से जल्द से जल्द विरोध स्थल खाली करने और कैंपस में शांति बहाल करने की अपील की गई है।
- दीवारों पर लिखे गए आपत्तिजनक नारों को मिटाकर उन्हें दोबारा पेंट किया जाएगा।
- सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही गलत जानकारियों और झूठ पर कड़ा ऐतराज जताया गया है।
कुलपति प्रोफेसर मज़हर आसिफ ने चिंता जताई कि इस तरह की घटनाओं का असर छात्रों के भविष्य, उनकी प्लेसमेंट और उच्च शिक्षा के अवसरों पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों की हरकतों की वजह से पूरी यूनिवर्सिटी की साख दांव पर नहीं लगाई जा सकती।
गौरतलब है कि JMISU को साल 2006 में हिंसा और शिक्षकों पर हमलों के कारण निलंबित कर दिया गया था। प्रशासन का दावा है कि उन्होंने 21 अक्टूबर को एक ड्राफ्ट कमेटी का गठन किया, जो 2006 के बाद पहली बार किसी कुलपति द्वारा उठाया गया कदम है। इसके बावजूद, भूख हड़ताल पर बैठे छात्र प्रशासन के साथ बातचीत करने को तैयार नहीं हैं और तनाव बढ़ाते जा रहे हैं।