भारत में वायु प्रदूषण कम करना आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक चुनौती: लैंसेट रिपोर्ट

दुनियाभर में स्वास्थ्य संकटों पर नजर रखने वाले मशहूर मेडिकल जर्नल 'द लैंसेट' ने एक चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के लिए हवा में घुले जहरीले कणों (PM2.5) को कम करना कोई आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि यह एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बन चुकी है। बर्लिन में वर्ल्ड हेल्थ समिट के दौरान पेश की गई इस रिपोर्ट में वायु प्रदूषण को इस सदी के उन 17 सबसे खतरनाक खतरों में शामिल किया गया है, जो पूरी मानवता के लिए विनाशकारी साबित हो सकते हैं।
रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि भारत सरकार वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए जरूरी कड़े कदम उठाने से कतरा रही है। इसका मुख्य कारण कृषि पद्धतियां हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदूषण का एक बड़ा हिस्सा खेती के तरीकों और पराली जलाने से आता है, लेकिन सरकार राजनीतिक कारणों से इन पर सख्ती करने से हिचकिचा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य का नुकसान दशकों तक जमा होता रहता है, जबकि राजनीतिक बाधाएं इन समस्याओं के समाधान में रोड़ा बनी रहती हैं।
स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ रहा है प्रदूषण
लैंसेट की रिपोर्ट केवल चेतावनी ही नहीं देती, बल्कि इसके डराने वाले आंकड़े भी पेश करती है। रिपोर्ट के अनुसार:
- साल 2022 में भारत में वायु प्रदूषण के कारण करीब 17.2 लाख लोगों की जान गई।
- बाहरी वायु प्रदूषण से होने वाली समयपूर्व मौतों का आर्थिक नुकसान करीब 339 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो भारत की जीडीपी का लगभग 9.5 प्रतिशत है।
- देश में PM2.5 के संपर्क में आने के कारण औसत जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) में 3.5 साल की कमी आई है, जबकि उत्तर भारतीय राज्यों में यह आंकड़ा और भी ज्यादा है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि केवल वायु प्रदूषण ही नहीं, बल्कि परमाणु संघर्ष और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का गलत इस्तेमाल मानवता के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकते हैं। वहीं, जलवायु परिवर्तन, कुपोषण और मोटापे जैसे खतरों को भी गंभीर श्रेणी में रखा गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तर-पश्चिम भारत के किसान कम समय और मजदूरों की कमी के कारण पराली जलाते हैं, जो उनके लिए एक तात्कालिक विकल्प होता है। अब चुनौती यह है कि सरकारें खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय और चुनावी राजनीति के बीच संतुलन बनाते हुए वायु गुणवत्ता के लक्ष्यों को कैसे हासिल करती हैं। प्रोफेसर क्रिस्टोफर जे.एल. मरे ने जोर देकर कहा कि आज लिए गए फैसले ही अगली पीढ़ी के स्वास्थ्य को तय करेंगे, और देरी करने से भविष्य की कीमत और बढ़ जाएगी।