दिल्ली के हिंदू कॉलेज में प्रशासनिक विवाद और ज्यादा बढ़ गया है। कॉलेज की गवर्निंग बॉडी ने दो प्रमुख शिक्षकों डॉ. रतन लाल और डॉ. पी.के. विजयन को औपचारिक रूप से कारण बताओ नोटिस जारी किया है। यह नोटिस कॉलेज के आचार संहिता के कथित उल्लंघन का हवाला देते हुए दिए गए हैं। यह कदम हिंदू कॉलेज स्टाफ एसोसिएशन (HCSA) द्वारा 14 सितंबर 2026 से शुरू किए गए एक सप्ताह लंबे धरने के बाद उठाया गया है। इस विरोध प्रदर्शन में छात्रों ने भी कॉलेज प्रशासन से जवाबदेही की मांग करते हुए हिस्सा लिया है।
यह पूरा विवाद अगस्त 2026 के दौरान खेल और अतिरिक्त पाठ्यचर्या गतिविधियों (ECA) सुपरन्यूमेरी कोटे के तहत प्रवेश में कथित प्रक्रियात्मक उल्लंघनों और धोखाधड़ी से ज्यादा सीटों के आवंटन पर केंद्रित है। HCSA का आरोप है कि राजनीति विज्ञान (ऑनर्स) और बी.कॉम (ऑनर्स) जैसे पाठ्यक्रमों में दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के नियमों का उल्लंघन हुआ है। नियमों के अनुसार संयुक्त खेल और ECA प्रवेश कुल स्वीकृत सीटों के 5 प्रतिशत से अधिक नहीं होने चाहिए और किसी भी एक स्नातक पाठ्यक्रम को उन सुपरन्यूमेरी सीटों का 20 प्रतिशत से अधिक नहीं मिलना चाहिए।
18 अगस्त 2026 को HCSA ने इन अनियमितताओं और संभावित भ्रष्ट प्रथाओं की चिंताओं का हवाला देते हुए प्रिंसिपल प्रोफेसर अंजू श्रीवास्तव के खिलाफ सर्वसम्मति से अविश्वास प्रस्ताव पारित किया था। इस प्रस्ताव को कुलपति, कॉलेज डीन और गवर्निंग बॉडी के अध्यक्ष को औपचारिक रूप से सौंप दिया गया था। डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट (DTF) ने यह भी आरोप लगाया है कि प्रोफेसर श्रीवास्तव ने ज्ञात त्रुटियों के बावजूद प्रवेश प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए सांविधिक निकायों पर दबाव डाला। जहां कॉलेज प्रशासन ने इन विसंगतियों को एक एल्गोरिथम की गलती बताया है, वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रवेश डीन ने स्वीकार किया कि 20 प्रतिशत की सीमा को खेल और ECA कोटे के लिए अलग-अलग लागू करने के बजाय पाठ्यक्रम स्तर पर गलत तरीके से लागू किया गया था।
HCSA के अध्यक्ष के रूप में कार्य करने वाले डॉ. रतन लाल और सचिव डॉ. पी.के. विजयन इस विवाद के केंद्र में बने हुए हैं। DTF ने औपचारिक रूप से DU के कुलपति योगेश सिंह से प्रवेश में हुई गड़बड़ियों की एक स्वतंत्र जांच शुरू करने का अनुरोध किया है। प्रिंसिपल श्रीवास्तव का कहना है कि आवंटन प्रक्रिया का प्रबंधन विश्वविद्यालय द्वारा किया जाता है और वितरण में कॉलेज की कोई भूमिका नहीं है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि विश्वविद्यालय पहले ही इस मामले को एक अनजाने में हुई गलती के रूप में पहचान चुका है।