युवराज मंचांडा मर्डर केस: गुरुग्राम पुलिस और डॉक्टर की लापरवाही पर दिल्ली कोर्ट सख्त, जांच के आदेश

Kittu Kumari17 October 20262 min read0 viewsNCR
युवराज मंचांडा मर्डर केस: गुरुग्राम पुलिस और डॉक्टर की लापरवाही पर दिल्ली कोर्ट सख्त, जांच के आदेश

दिल्ली की साकेत कोर्ट ने एक बेहद गंभीर मामले में गुरुग्राम पुलिस और एक मेडिकल ऑफिसर की भूमिका की जांच करने का आदेश दिया है। मामला 31 वर्षीय रियल एस्टेट प्रोफेशनल युवराज सिंह मंचांडा की मौत से जुड़ा है, जिसमें सबूतों के साथ कथित तौर पर छेड़छाड़ और प्रक्रियात्मक लापरवाही के गंभीर आरोप लगे हैं। न्यायिक मजिस्ट्रेट राहुल जैन ने इस मामले की जांच शुरू करते हुए कहा कि अधिकारियों की मिलीभगत से सबूतों को गायब करने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।

कोर्ट ने गुरुग्राम पुलिस द्वारा की गई जांच को 'बिल्कुल गड़बड़' और 'बॉटचड' (खराब तरीके से किया गया) करार दिया है। यह पूरी कार्रवाई मृतक की बहन हरसिमरन की याचिका के बाद हुई, जिसमें उन्होंने पोस्टमार्टम रिपोर्ट और दिल्ली पुलिस की जांच के बीच भारी विसंगतियों की ओर इशारा किया था।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट और पुलिस की कहानी में बड़ा अंतर

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इस केस में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। दिल्ली पुलिस ने उत्तराखंड के कैंची धाम से अन्या वत्स और संयम सचदेवा को गिरफ्तार किया था। आरोपियों ने कबूल किया कि उन्होंने 6 सितंबर 2026 को युवराज की गर्दन के पास दो गोलियां मारी थीं। लेकिन, गुरुग्राम के सिविल अस्पताल के डॉक्टर मानव चौहान की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह 'डूबना' (ante-mortem drowning) बताई गई और शरीर पर किसी भी बाहरी चोट का जिक्र नहीं किया गया।

कोर्ट ने इस मामले में कई बड़ी खामियां पकड़ी हैं:

  • शरीर में गोली जैसी धातु की वस्तुओं का पता लगाने के लिए कोई एक्स-रे नहीं किया गया।
  • 14 सितंबर को हुए पोस्टमार्टम के दौरान अनिवार्य वीडियो या फोटोग्राफी नहीं की गई।
  • विसरा या अन्य फॉरेंसिक सैंपल सुरक्षित नहीं रखे गए।
  • पुलिस ने डूबने की थ्योरी को सच साबित करने के लिए एक प्रॉपर्टी डीलर की शिकायत ली, जिसे कोर्ट ने झूठे सबूत गढ़ने की कोशिश बताया।
  • बॉडी को 10 सितंबर को बादशाहपुर नाले से निकाला गया था, लेकिन उसकी जानकारी ZIPNET डेटाबेस पर 16 सितंबर को अपलोड की गई, जबकि अंतिम संस्कार 14 सितंबर को ही हो चुका था।

15 अक्टूबर की सुनवाई के दौरान पुलिस और डॉक्टर के बीच भी टकराव दिखा। गुरुग्राम पुलिस ने आरोप लगाया कि डॉक्टर ने डीएनए के लिए जांघ की हड्डी सुरक्षित नहीं रखी, जबकि डॉक्टर चौहान का तर्क था कि पुलिस ने मामले को 'गैर-संदिग्ध' बताया था, इसलिए विसरा सुरक्षित नहीं रखा गया।

इस मामले में हरियाणा के डीजीपी अजय सिंघल ने भी खामियों को स्वीकार किया है। अब तक एक एएसआई को निलंबित किया जा चुका है और बादशाहपुर एसएचओ, जांच अधिकारी और पीसीआर इंचार्ज के खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर दी गई है। कोर्ट ने डॉक्टर चौहान को अगली सुनवाई 27 अक्टूबर तक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जमा करने का निर्देश दिया है।

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