कॉर्पोरेट तनाव से बचने के लिए गुरुग्राम के प्रोफेशनल्स ने पकड़ी खेती की कमान

गुुरुग्राम की ऊंची इमारतों और ऑफिस के भारी काम के दबाव के बीच अब एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है। यहां के कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स अपनी मानसिक शांति और तनाव से मुक्ति पाने के लिए गुरुग्राम अर्बन फार्मिंग का रास्ता चुन रहे हैं। शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी से दूर, अब लोग मिट्टी और पौधों के साथ समय बिताकर सुकून तलाश रहे हैं।
इस बदलाव की वजह केवल शौक नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य भी है। कई लोग अब ऐसे कम्युनिटी फार्म क्लब्स से जुड़ रहे हैं, जहां वे बिना किसी भारी निवेश के खेती का अनुभव ले सकते हैं। दरअसल, अगर कोई व्यक्ति निजी तौर पर खेती के लिए जमीन किराए पर लेता है, तो उसका मासिक खर्च कम से कम 50,000 रुपये तक जा सकता है, जो हर किसी के लिए मुमकिन नहीं है। ऐसे में ये फार्म क्लब एक किफायती विकल्प बनकर उभरे हैं।
कॉर्पोरेट लाइफ और खेती का जुड़ाव
गुुरुग्राम फार्म क्लब के सह-संस्थापक मुकेश राणा, जो खुद कभी कॉर्पोरेट जगत का हिस्सा थे, बताते हैं कि महामारी के बाद से खेती के प्रति लोगों का आकर्षण काफी बढ़ा है। ये क्लब खेती की जटिलताओं को संभालते हैं, जिससे सदस्यों को बिना किसी बड़े वित्तीय बोझ के अपनी रुचि पूरी करने का मौका मिलता है।
वहीं, 2014 में फाइनेंस करियर छोड़कर 'एडिबल रूट्स' की शुरुआत करने वाले कपिल मंडवेवाला का मानना है कि यह ट्रेंड फिलहाल एक खास वर्ग तक सीमित है। उनके अनुसार, यह मुख्य रूप से उन कॉर्पोरेट कर्मचारियों को आकर्षित कर रहा है जो वर्कप्लेस स्ट्रेस से राहत चाहते हैं।
गुुरुग्राम ऑर्गेनिक फार्मर्स मार्केट के सह-संस्थापक मानस अरविंद इस मुहिम को एक बड़े स्तर पर ले जाना चाहते हैं। उनका कहना है कि शहरी किसानों, पारंपरिक किसानों और उपभोक्ताओं के बीच एक ऐसा इकोसिस्टम बनना चाहिए, जिससे न केवल जीवन की गुणवत्ता सुधरे, बल्कि स्वास्थ्य और सामुदायिक जुड़ाव भी बढ़े।
हालांकि, इस बढ़ते रुझान के बीच कुछ चुनौतियां भी हैं। हरियाणा सरकार द्वारा 30 सितंबर 2026 को जारी एक सार्वजनिक नोटिस में भूमि उपयोग नियमों में बदलाव का प्रस्ताव दिया गया है, जिस पर अभी विचार-विमर्श चल रहा है। हालांकि फिलहाल छोटे पैमाने पर सब्जियों की खेती पर कोई खास पाबंदी नहीं है, लेकिन भविष्य में भूमि उपयोग के नियमों को लेकर सवाल बने हुए हैं।