गूगल की ईमेल सर्विस 'पब्लिक फंक्शन' नहीं, अकाउंट बंद होने पर रिट याचिका नहीं चलेगी: दिल्ली हाई कोर्ट

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि केवल इसलिए कि लोग किसी निजी कंपनी की ईमेल सेवाओं पर निर्भर हैं, वह सेवा 'पब्लिक फंक्शन' (सार्वजनिक कार्य) नहीं बन जाती। कोर्ट ने कहा कि गूगल जैसी निजी कंपनी द्वारा ईमेल सेवाएं प्रदान करना एक व्यावसायिक गतिविधि है और इसे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार के दायरे में नहीं लाया जा सकता।
यह पूरा मामला 'जनता लाइव प्रेस नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड' और उसके डायरेक्टर द्वारा दायर एक याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने गूगल एलएलसी और गूगल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ याचिका दायर कर अपने जीमेल अकाउंट को बहाल करने की मांग की थी। कंपनी का दावा था कि 20 जुलाई को उनके अकाउंट को किसी तीसरे पक्ष ने अनधिकृत रूप से एक्सेस कर लिया था, जिसके बाद गूगल ने 'असामान्य गतिविधि' का हवाला देते हुए अकाउंट को डिसेबल कर दिया। कंपनी ने साइबर पुलिस स्टेशन में शिकायत भी की और गूगल सपोर्ट से संपर्क किया, लेकिन उन्हें कोई समाधान नहीं मिला।
व्यावसायिक गतिविधि और सार्वजनिक कर्तव्य में अंतर
कोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि गूगल एक सार्वजनिक कार्य करता है, इसलिए इसके खिलाफ रिट याचिका सुनवाई योग्य होनी चाहिए। हालांकि, जस्टिस अमित महाजन ने इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यह तय करने के लिए कि किसी निजी संस्था के खिलाफ रिट याचिका चल सकती है या नहीं, उस संस्था की लोकप्रियता या उसकी पहुंच नहीं, बल्कि उसके द्वारा किए जा रहे कार्य की प्रकृति देखी जाती है।
कोर्ट ने विस्तार से बताया कि ईमेल, होस्टिंग या अन्य डिजिटल सेवाएं प्रदान करना किसी कंपनी की कमर्शियल एक्टिविटी है। सुरक्षा कारणों से किसी अकाउंट को निलंबित करना किसी सार्वजनिक कर्तव्य का निर्वहन नहीं माना जा सकता। जस्टिस महाजन ने यह भी कहा कि ईमेल सेवाएं देने वाले बाजार में कई अन्य स्वतंत्र प्रदाता मौजूद हैं और यह गूगल का एकाधिकार नहीं है। इसलिए, किसी मीडिया बिजनेस के लिए अकाउंट का महत्व होने से गूगल की गतिविधि की प्रकृति नहीं बदल जाती।
अदालत ने स्पष्ट किया कि शिकायत निवारण और इंटरमीडिएटरी गाइडलाइन्स से जुड़े वैधानिक दायित्वों का होने मात्र से हर अकाउंट विवाद या कस्टमर सपोर्ट की विफलता को रिट याचिका का आधार नहीं बनाया जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।