दिल्ली के अस्पताल में एंडोस्कोपिक माइग्रेन सर्जरी, 10 साल के असहनीय दर्द से मिला छुटकारा

दिल्ली के एक निजी अस्पताल ने 10 साल से माइग्रेन से जूझ रहे मरीज की एंडोस्कोपिक सर्जरी कर उसे दर्द से राहत दिलाई।

Kittu Kumari28 October 20262 min read0 viewsDelhi Local
दिल्ली के अस्पताल में एंडोस्कोपिक माइग्रेन सर्जरी, 10 साल के असहनीय दर्द से मिला छुटकारा

दिल्ली के एक निजी अस्पताल में डॉक्टरों ने एक ऐसी एडवांस सर्जरी की है, जिसने एक मरीज को पिछले 10 सालों से सता रहे माइग्रेन के भीषण दर्द से राहत दिलाई है। यह मरीज करीब एक दशक से गंभीर और क्रोनिक माइग्रेन से जूझ रहा था, जिसके कारण उसकी दिनचर्या पूरी तरह प्रभावित हो चुकी थी। अस्पताल के सीनियर प्लास्टिक सर्जन डॉ. स्वरूप सिंह गंभीर ने इस जटिल एंडोस्कोपिक माइग्रेन सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम दिया।

बताया गया है कि सर्जरी से पहले मरीज की हालत काफी खराब थी और उसे हर महीने करीब 20 से 25 बार माइग्रेन के अटैक आते थे। इतने सालों तक कई विशेषज्ञों से सलाह लेने और तमाम तरह के मेडिकल इलाज करवाने के बावजूद उसे कोई स्थायी आराम नहीं मिल रहा था। जब दवाइयां बेअसर साबित हुईं, तब डॉक्टरों ने क्लिनिकल जांच के बाद सर्जरी का विकल्प चुना।

कैसे काम करती है एंडोस्कोपिक माइग्रेन सर्जरी?

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जांच के दौरान डॉक्टरों ने मरीज के टेम्पोरल (कनपटी) और ओसीसीपिटल (सिर का पिछला हिस्सा) क्षेत्रों में 'ट्रिगर पॉइंट्स' की पहचान की। ये वे हिस्से होते हैं जहां नसें दबने या उत्तेजित होने के कारण सिरदर्द शुरू होता है। इसके बाद एंडोस्कोपिक नर्व डिकंप्रेशन की प्रक्रिया अपनाई गई। इसमें एक पतले कैमरे (एंडोस्कोप) की मदद से छोटे चीरे लगाकर उन ऊतकों को हटाया गया जो नसों को दबा रहे थे।

सर्जरी के बाद के शुरुआती नतीजों में मरीज ने काफी सुधार महसूस किया है। अब उसके सिरदर्द की तीव्रता और अवधि में लगभग 50% की कमी आई है और सिर के पिछले हिस्से का दर्द पूरी तरह खत्म हो गया है। इस प्रक्रिया से न केवल मरीज के जीवन की गुणवत्ता में सुधार हुआ है, बल्कि अब उसे पहले की तुलना में बहुत कम दवाइयों की जरूरत पड़ रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि माइग्रेन सर्जरी हर मरीज के लिए नहीं होती और यह इलाज का पहला विकल्प भी नहीं है। यह केवल उन चुनिंदा मरीजों के लिए है जिनमें नर्व ट्रिगर पॉइंट्स की पहचान हो जाती है और जिन पर दवाइयां काम नहीं करतीं। इसके लिए मरीज की पूरी हिस्ट्री और फिजिकल एग्जामिनेशन के बाद ही यह फैसला लिया जाता है।

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